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भीड़ क्या होती है और ये कैसे काम करती है? कुछ चौकाने वाले खुलासे…

भीड़ का मनोविज्ञान :-

क्या होती है भीड़ और किसे कहते है भीड़?
भाइयों बहनों मनोविज्ञान के अनुसार भीड़ एक खास परिस्थिति में लोगों का एक ऐसा समूह है, जिस में एक निजी व्यक्ति का व्यक्तित्व विलीन हो जाता है, और उस के स्थान पर एक सामूहिक मन का निर्माण होता है, जो एक निर्दिष्ट दिशा की ओर संचालित होता है।

भाइयों बहनों मानव मन के तीन मुख्य अवयव हैं-
1. भावना
2. विचार
3. और विवेक
इनसे ही मनुष्य के व्यवहार का निर्धारण होता है। विचार मनुष्य को अकेला करता है और विवेक उसे भीड़ का हिस्सा बनने से रोकता है। भावना ही है जो उसे भीड़ का हिस्सा बनाती है। बहुत सोचने वाला व्यक्ति किसी सभा-जुलूस में शिरकत करने से अकसर परहेज करता है। अगर वह इनमें शामिल भी होता है तो किसी खास विचार के प्रति भावनात्मक लगाव के कारण। भीड़ में शामिल व्यक्ति मूलत: भावना से संचालित होता है इसलिए उसके विचार और विवेक के पक्ष कमजोर पड़ जाते हैं। इन दिनों जो भीड़ के आक्रामक हो उठने की घटनाएं हो रही हैं, उन्हें इस जानकारी की रोशनी में देखा जा सकता है।

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भाइयों-बहनों भीड़ में प्रबल आवेष होता है और इसमें एकत्रित सभी व्यक्तियों का आवेग एक साथ काम कर रहा होता है, इसलिए व्यक्ति अनचाहा इस ओर खिचा चला आता है और अनैच्छिक रूप से भीड़ के अनुरूप बढ़ता है, करता है। भाइयों-बहनों चोरी में पकड़े गए चोर पर भीड़ बुरी तरह से टूट पड़ती है। भीड़ की नजर में बस एक ही बात रहती है कि जिसे लोग पीट रहे है, उस पर टूट पड़ा जाए। कोई यह नहीं समझता कि जिसे पीटा जा रहा है, वह अपराधी है भी या नही?

भाइयों-बहनों भीड़ तो अफवाहों से चलती है। अपराधी तत्व संवेदनशील समय में ऐसी अफवाहों का सहारा लेकर अपने खतरनाक मंसूबो को पूरा करते है। भीड़ का आवेग एकदम उफान पर होता है। वह उन्मत हाथी के समान रौंदती कुचलती आगे बढ़ती है, फिर चाहे उस के सामने कोई क्यों न आ जाए। भगदड़ में नन्हें निरीह बच्चे, दुर्बल व्यक्ति, बूढ़े आदि को हानि पहुंचती है क्योंकि इस चरम पर कोई दया भावना नहीं होती है। यदि वह अपने चरम नहीं होगा तो शायद कोई अमानवीयता की घटना संभव नहीं होती। ऐसा एक अमानवीय रूप 1984 के दिल्ली के दंगों में देखा गया था।

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मेरे देशवाशियों सौ करोड़ से अधिक आबादी का देश भारत आज हर स्तर पर भीड़ का देश बनता जा रहा है। विचार और विवेक के सहारे जीवन जीने वाले लोग अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। राजनीति को विचार और विवेक की दुनिया रास नहीं आ रही। कोई भी दल हो उसे भीड़ चाहिए, भावनाओं की आंधी में उड़ती हुई भीड़। भाइयों-बहनों मनोवैज्ञानिक के अनुसार भीड़ की नैतिकता अत्यंत कमजोर होती है। यहां पर नैतिकता ढूंढ़ना बालू में सुई ढूंढने जैसा है। यह तो निर्भर करती है, जो इसे संचालित करता है। यदि संचालित करने वाला कोई श्रेष्ठ धार्मिक व्यक्ति हो जो भीड़ से श्रेष्ठ काम करा लेता है, परंतु ऐसा कम देखने को मिलता है।

अंधेभक्त ज़रा ध्यान दे:- मनुष्य में देवीय तत्व की तुलना में आसुरी प्रवृत्ति अधिक सघनता के रूप में पाई जाती है। भीड़ में ऐसी आसुरी प्रवृत्ति को बल मिलता है। आजकल इस भीड़ का उपयोग अपने शक्ति प्रदर्षन के लिए किया जाता है।

1: राजनीतिक नेता अपनी प्रसिद्धि और फकीरी दिखाने के लिए लोगों को किराए पर लाते है और अपार भीड़ के रूप में एकत्र करते है। ऐसे भीड़ तंत्र में अपनी जयजयकार करवाते है। धार्मिक नेता भी धार्मिक जलूस निकालने के लिए इस भीड़ का भरपूर प्रयोग करते है। चाहे तो सामाजिक कार्यकरता भीड़ से स्वच्छता, सफाई का अभियान चलाकर श्रेष्ठ काम करा लेते है।

कॉरपोरेट लीडरों को भीड़ चाहिए लालची ग्राहकों की। धर्म गुरुओं और बाबाओं को भीड़ चाहिए #ली बजाने वालों की। आज पूरे देश में विचार और विवेक से रहित भीड़ की संस्कृति विकसित की जा रही है। यह भीड़ भूखी है क्योंकि जीने के साधनों के वितरण में असंतुलन बढ़ता जा रहा है, यह भीड़ उदारीकण की कृपा से लालची और अनुचित रूप से महत्वाकांक्षी भी है। यह भीड़ अपने अधिकारों के प्रति इस हद तक सजग है कि उसे अपने कर्तव्य और दूसरे के अधिकार दिखाई तक नहीं पड़ रहे। जो हालात हैं और बनाए जा रहे हैं उनमें इस भीड़ का हिंसक हो उठना अस्वाभाविक नहीं है। भूखी लालची और असुरक्षा की भावना से भरी विवेक शून्य भीड़ के हाथों कोई भी कहीं भी मारा जा सकता है।

2: समूह में होने से लोगों के सोचने और व्यवहार करने का तरीका बदल जाता है। उदाहरण के लिए किसी टीम के साथ ट्रेनिंग करने पर एथलीट अपनी शारीरिक क्षमता को और अधिक बढ़ा सकते हैं। लेकिन, भीड़ खतरनाक भी हो सकती है क्योंकि वह एक तरह की तथाकथित भेड़ चाल की मानसिकता का विस्तार करती है। दूसरों के साथ कुछ करते हुए लोग अपनी आक्रामक गतिविधियों और अन्य कारनामों के लिए अक्सर स्वयं को कम जिम्मेदार मानते हैं। वे अज्ञात जैसा महसूस करते हैं। वे कई बार अपने आसपास के लोगों की वाहवाही लूटने के लिए जानबूझकर गलत कदम उठाते हैं।

भाइयों-बहनों हमने अपनी रिसर्च में पाया कि भीड़ की उत्तेजना के बहाव में लोग अपने निजी नैतिक सिद्धांतों और व्यवहार को भुला देते हैं। भाइयों-बहनों भीड़ तो एक आवेग का उफान है, इसे जैसा प्रयोग कर लिया जाए, क्योंकि भीड़ की बुद्धि नहीं होती है, किंतु भीड़ को सृजनशील कार्यों में लगा दिया जाए, तो ही इस का महत्व सिद्ध होता है।

मेरे देशवाशियों निश्चय ही इन कारणों से नव वर्ष पर महिलाओं को बेइज्जत करने वाले या अपराध करने वाली भीड़ का दोष कम नहीं हो जाता है। इससे पता लगता है कि यदि लोग किसी एक समूह में होते हैं तो उनमें से अधिक लोगों द्वारा अपराध करने की संभावना ज्यादा रहती है। भाइयों-बहनों उनके अपनी मर्यादा का उल्लंघन करने की संभावना रहती है। भाइयों-बहनों भीड़ में शामिल व्यक्ति भीड़ का हिस्सा होता है। वहां व्यक्ति का दिमाग कब एक ऐसे सामूहिक दिमाग का हिस्सा बन जाता है, जो भावनाओं में निर्देशित हो रहा है, पता चलना कठिन है।

मेरे देशवाशियों कोई उकसावा, कोई निर्देश या कोई हल्ला उसे इस तरह बहा ले जाता है जैसे समुद्र की लहर पानी के खाली बोतल को बहा ले जाती है। भाइयों-बहनों भीड़ के स्वभाव को सिर्फ राजनेता और धर्मगुरु ही नहीं जानते अपराधी और समाज की हिंसक शक्तियां भी जानती हैं। भाइयों-बहनों भीड़ में सचेतना एवं विचार समाप्त हो जाते है। भाइयों-बहनों भीड़ में बुद्धि, विवेक, विचार काम नहीं करता है, बल्कि आवेग का उफान उगमता है। भाइयों-बहनों भीड़ आवेग की बाढ़ है। उस बाढ़ में उफनते हुए प्रवाह के रूप में भीड़ बहती है। मेरे देशवाशियों इस में सामूहिक चेतना अपने चरम पर काम करती है। इसलिए व्यक्ति यहां पर खिंचा चला आता है और यही वजह है कि भीड़ में व्यक्ति बड़ा सकून महसूस करता है।

भाइयों-बहनों भीड़ में खुद को खोते है और एकाकीमन में, स्वंय को पाते है। हमें तय करना है कि हमें खोना या पाना है। भाइयों-बहनों कुछ लोग इसके लिए संस्कृति और आचार-विचार को दोषी ठहराते हैं। लेकिन, इसके पीछे एक अन्य फैक्टर काम कर रहा होता है। वह है स्वयं भीड़। एक और बात, हर व्यक्ति के भीतर हिंसक विचार होते है। मगर वह उन्हें प्रकट करने में उसी तरह झिझकता है, जैसे रोशनी में सबके सामने कपड़ा उतारने में। भीड़ में अंधेरे में व्यक्ति की हिंसकता मुखर हो उठती है।

– अंधेभक्तो को समर्पित

(मोनिका जौहरी Shoib Neuropsych- The mind healer में डॉक्टर के पद पर कार्यरत हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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