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रवीश कुमार पर संसद में बहस हो!

जब से रवीश कुमार ने सीबीआई छापे के बाद एनडीटीवी की खुलकर हिमायत की है और सरकार को जमकर लताड़ लगाई है, तब से रवीश की शख्सियत कई मायनों में उभरकर सामने आई है। हालांकि इससे पहले भी रवीश की रिपोर्ट से उन्होंने देशभर में खूब ख्याति प्राप्त की हुई है।

सोशल मीडिया पर खुले शब्दों में कहा जा रहा है कि इस देश में रवीश कुमार जैसा इंसान प्रधानमंत्री बनना चाहिये। कुछ रवीश को राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं। तो कुछ लोग उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। इतना ही नहीं कुछ नौजवान उन्हें सीबीआई का प्रमुख बनाने की हिमायत कर रहे हैं, तो कुछ उन्हें पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिये भारत का गृहमंत्री बनाना चाहते हैं। यही नहीं सोशल मीडिया पर रवीश कुमार के चाहने वाले ये भी कहने से नहीं चूक रहे हैं कि रवीश के पास वो सारी पावर होनी चाहिये जिनमें कोई भी दखल ना दे सके।

ये तमाम बातें अपनी जगह सही हैं और इनकी अपनी अहमियत है। लेकिन देशभर में जो माहौल अब बनता दिखाई दे रहा है उसकी इजाज़त खुद रवीश भी नहीं देंगे। दरअसल सोशल मीडिया पर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उनमें से कुछ बहुत ही ज़्यादा संजीदा और सोचनीय हैं और अगर इसी तरह से जनमत बनता रहा तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे, जो देश के लिये सही साबित नहीं होंगे।

ऐसी कितनी ही बातों को आप भी देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं। कभी उन्हें हिंदी पत्रकारिता का जनक कहा जाता है, तो कभी सबसे बड़ा सामाजिक रखवाला, दूसरों की मदद करने वाला, गरीबों का हमदर्द, बेरोज़गारों की बातों को उठाने वाला, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों या पिछड़ों का मसीहा भी जब-तब उन्हें कहा जाता रहा है।

ऐसे में सवाल यही उभरकर सामने आता है कि क्या रवीश देश की किसी भी संस्था से बड़े हो गये हैं। क्या देशवासियों के सामने आज रवीश के सिवा कोई दूसरी बड़ी उम्मीद नहीं बची है। यक़ीनन रवीश कुमार हरगिज़ इन बातों की इजाज़त देशवासियों को नहीं देंगे। क्योंकि सबसे बड़ा सच यही है कि जिन संस्थानों को कुछ लोग नाकारा या बेकार करार दे रहे हैं, वास्तव में खुद रवीश कुमार भी उन्हीं संगठनों का हिस्सा है।

रवीश कुमार का लोकतंत्र पर भी उतना ही विश्वास है जितना संविधान पर है। कानून की भी वो उतनी ही इज्ज़त करते हैं, जितना कि देश के अन्य नागरिक करते हैं। रवीश कुमार को देश के ताने-बाने से भी प्यार है और देश की विविधता से भी।

मगर नागरिक क्या करें, क्या जो मत उनका बन रहा है, रवीश के समर्थन में, और देश के समूचे सिस्टम के खिलाफ, उस पर मंथन नहीं किया जाना चाहिये। उस पर मीडिया में बहस नहीं होनी चाहिये, क्या लोगों के बन रहे इस जनमत पर संसद के दोनों सदनों में बहस नहीं होनी चाहिये? तो मैं कहूंगा कि कायदे से बहस भी होनी चाहिये ओर सलीके से लोगों की नब्ज को भी टटोलना चाहिये कि नागरिकों की सरकार तथा व्यवस्था से इस नाराजगी का कारण क्या है? क्या आपके देश, समाज और व्यवस्था में सब सही है? बहुत सारी चीज़ें सामने निकल आयेंगी जो आनी चाहिये भी।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ये झूठ है कि पुलिस किसी से भी रिश्वत नहीं लेती एफआईआर भी आसानी से लिख देती है। हो सकता है ये भी पता चले कि नेताओं से लोग खुश हैं। इस बात का भी खुलासा हो सकता है कि सरकारी कार्यालयों में वक्त पर काम हो जाते हैं और रिश्वत का तो कहीं अता-पता भी नहीं है। एक चपरासी की नौकरी के लिये पीएचडी धारक आवेदन करता है, ये भी झूठ हो सकता है क्योंकि इन सब बातों से देश की दुनियाभर में खूब फज़ीहत होती है।

हो सकता है बलात्कार की खबरें भी बनावटी हों, हो सकता है रोजगार खूब हों, हो ये भी सकता है कि अल्पसंख्यक सरकारों के कारनामों से बहुत खुश हों।हो सकता है किसानो को मारे जाने की ख़बरें या आत्महत्या की खबरें भी झूठ हो। हो सकता है जंतर-मंतर पर आये दिन चलने वाले आंदोलन झूठ का पुलिंदा हों। कुछ भी हो, सामने आना चाहिये, आखिर सरकार पर विश्वास बढ़े, ये तो हर मौजूदा सरकार चाहती है ना!

 

लेखक- जुबेर खान डेम्रोत

(ये लेखक के निजी विचार है।)

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