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बिहार में सामाजिक न्याय के मसीहा कैसे बने लालू यादव?

भारतीय राजनीति के इस बहुचर्चित बिहारी नेता की अब उम्र 69 साल हो गई है। गोपालगंज ज़िले के फुलवरिया गाँव में एक ग़रीब यादव परिवार में जन्मे। स्कूलिंग के पटना यूनिवर्सिटी से स्नातक और कानून की पढ़ाई की और साथ ही छात्र जीवन में ही छात्र राजनीति में काफी सक्रिय रहे और पटना यूनिवर्सिटी स्टुडेंट यूनियन का चुनाव जीत कर प्रेसीडेंट भी रहे।

फिर देश में इंदिरा गांधी का विरोध शुरू हो चुका था लालू यादव भी जेपी के साथ आंदोलन में शामिल हो गए और फिर जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया और पूरे देश में नेताओं के साथ लाखों आंदोलनकारियों को भी जेल में बंद कर दिया गया जिसमें लालू जी भी जेल चले गए और जब एमरजेंसी खत्म हुआ और 1977 के लोकसभा चुनाव में जेपी के अगुआई में जनता पार्टी को जीत मिली कांग्रेस पहली बार देश के सत्ता से बाहर हो गई, तब लालू प्रसाद यादव 29 वर्ष के युवा सांसद के तौर पर सारन लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे।

फिर शुरू हुआ बिहार में लालू प्रसाद यादव जी का राजनीतिक सफर 1980 से 1989 तक 2 बार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता पद पर भी रहे।

फिर बिहार में सत्ता बदली और साल 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन गए और फिर खुद को समाजिक न्याय के मसीहा तौर पर अपनी छवि बनाई और बिहार के सत्ता में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ा और बिहार की राजनीति में पूर्ण रूप से बदलाव आ चुका था जो राजनीति सवर्णों के इर्द-गिर्द घूमती थी वह अब नए रूप में पिछड़ों और वंचितों के इर्द-गिर्द घूमने लगी और अबतक घूम रही है। इस समाजिक न्याय के आन्दोलन का ही ये नतीजा है कि आज नीतिश कुमार जी मुख्यमंत्री हैं और एक समय आया कि जीतन राम मांझी भी बिहार के मुख्यमंत्री बने। इस बदलाव के बाद बिहार में बहुत सारे नेता निकले।

लालू प्रसाद यादव यादव 1990 से लेकर 2005 तक अकेले अपने दम पर बिहार के सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे जिसके मुख्य कारण मुस्लिम-यादव के ठोस जनाधार और अन्य पिछड़ी जातियों के सहयोग से अपनी चुनावी रणनीति किसी तरह बनाए रखने में लालू कामयाब होते रहे।

आज भी लालू प्रसाद यादव के पास एक मज़बूत जनाधार है। बिहार के अंदर जो और किसी दल या नेता के पास नहीं है जिसका उदाहरण 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखाई दिया है। फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में जब-जब लालू यादव कमज़ोर हुए और फिर खुद को ‘किंगमेकर’ के रूप में दिखाया के अब भी लालू यादव के पास जनाधार है।

अपनी बात कहने का लालू यादव का खास अन्दाज है। बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों की तरह बनाने का वादा हो या रेलवे में कुल्हड़ की शुरुआत, या चरवाहा स्कूल खोलने की शुरुआत हो, कभी दलितों की बस्तियों में जाकर बच्चों को अपने हाथों से नहलाने का काम रहा हो, लालू यादव हमेशा ही सुर्खियों में रहे या फिर अपने विरोधियों पर हमला करना हो वो अपने अलग अंदाज़ और अलग तेवर में किसी को भी नहीं छोड़ते हैं। मोदी, अमित शाह या फिर भाजपा पर सबसे हमलावर दिखाई देते हैं। शायद देशभर में भाजपा के विरोध में लालू प्रसाद यादव के जितना आक्रमक हो। अबतक देश भर में लालू यादव जी की छवि एक मज़बूत सेक्युलरवादी और भाजपा विरोधी नेता की रही लालू प्रसाद यादव को उनकी इसी छवि ने बिहार में समाजिक न्याय का मसीहा बना दिया।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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