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शॉर्ट फिल्मों के माध्यम से जनजागरुकता अभियान चला रहे विदर्भ के आदिवासी युवा

adivasi youth takeing filmmaking training

महाराष्ट्र भारत के कुछ समृद्ध राज्यों में से एक माना जाता है। मगर इस महाराष्ट्र के भी दो चेहरे हैं। एक जो की देश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले मुंबई तथा उसके आस पास का है, जिसकी बॉलीवुड और शानो-शौकत जो इस राज्य के विकसित होने की कहानी कहते हैं। तथा दूसरा विदर्भ तथा उसके आस पास के इलाके जहां के किसान आत्महत्या की कहानी देश को हमेशा हिला कर रख देते हैं।

इन दोनों चेहरों से अलग इस राज्य का एक अति-पिछड़ा जिला ‘नंदुरबार अपने आप में एक अलग कहानी बना रहा है। मध्य प्रदेश तथा गुजरात की सीमाओं से लगा यह जिला भारत के कुछ अति-पिछड़े जिलों में से एक है। पूर्णतः आदिवासी मूल यह जिला कुछ सालों पहले चर्चा में था। वजह थी देश का सबसे पहला आधार कार्ड इसी जिले की एक महिला को दिया गया था। मगर पिछले कुछ दिनों से ये जिला फिर से चर्चा में है, और इस बार वजह है यहां के आदिवासी युवा। जिन्होंने अपनी सामजिक समस्याओं के ऊपर लोगों में जागरूकता लाने के लिए अपना एक तरीका ढूंढ निकला है।

नंदुरबार जिले के धड्गांव तालुका के महाराजा जनार्दन पोहर्या वाळवी कॉलेज के छात्र तथा इसी तालुका के हरंखुरी गाँव के कुछ युवाओं ने मिलकर अपनी सामाजिक समस्याओं पर लोगों में जागरूकता लाने के लिए लघु फिल्म (शार्ट फिल्म) बनाना शुरू किया है। पूर्ण रूप से मोबाइल फ़ोन पर तैयार ये लघु फ़िल्में यहाँ के लोकल समस्याओं को उजागर कर के इसके विषय में लोगों के बीच जागरूकता लाने का काम कर रही है।

यह युवा इन फिल्मों को स्वयंसेवी समूहों की बैठक तथा गांव के अन्य बैठकों में प्रोजेक्टर के सहारे लोगों को दिखा रहे हैं। इन युवाओं ने यू-ट्युब पर आदिवासी जनजाग्रति नाम का एक चैनल भी बनाया है जिसपे यह अपनी शार्ट फिल्मों को हर महीने डालते हैं। १० लोगों की इनकी टीम हर 15 दिन पर किसी भी एक सामाजिक समस्या को लेकर फिल्म बनाती है।

इस काम में इनकी मदद एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फ़ेलोशिप के तहत धड्गांव में काम कर रहे नितेश भरद्वाज कर रहे हैं। नितेश यहां बॉयफ संस्था के साथ ग्राम विकास पर काम कर रहे हैं। मूलतः बिहार राज्य के सिवान जिले के निवासी नितेश ने अपनी पढ़ाई देहरादून से पत्रकारिता तथा जनसंचार में की है। धड्गांव में अपने शुरुआती दिनों के दौरान इन्होने यहां के कई समस्याओं को बहुत करीब से देखा।

अपने अध्ययन के दौरान इन्होंने पाया की यहां कई सरकारी योजनाओं के होने के बावजूद लोगों में जागरूकता की बेहद कमी है। जिसकी वजह से यहां विकास की रफ़्तार बहुत धीमी है। अपने अध्ययन के दौरान इनकी मुलाकात महाराजा जनार्दन पोहर्या वालवी कॉलेज के प्राचार्य डॉ एचएम पाटिल से हुई। जिनके साथ मिलकर इन्होंने कॉलेज के छात्रों का अख़बार निकाला। जागृति नामक यह अख़बार पूरी तरह से छात्रों द्वारा तैयार है। इस अख़बार में संपादन, लेखन तथा डिजाईन का सारा काम छात्र खुद से करते हैं। इस काम के लिए नितेश तथा डॉ. पाटिल ने छात्रों का एक दल बनाया जिसे नितेश ने एक महीने की ट्रेनिंग दी।

लोगों से बातचीत करते नीतेश

नितेश ने इसके बाद कॉलेज के कुछ छात्रों तथा हरंखुरी गांव के युवाओं की एक टीम बनाई। जिसको इन्होंने मोबाइल के माध्यम से फिल्म बनाना तथा मोबाइल पर ही उसे सम्पादित करना सिखाया। दो हफ्ते के ट्रेनिंग के बाद इन युवाओं ने अपनी पहली फिल्म बाल मजदूरी के ऊपर बनाई। लगभग ४ मिनट की इस फिल्म को इन युवाओं ने 6 दिनों में पूरा किया। इस टीम के सदस्य राकेश पावरा बताते हैं कि “हमारे तालुका में बाल मजदूरी एक बहुत बड़ी समस्या है, मगर कोई भी इस विषय में बात नहीं करता, हमारी फिल्म देखने के बाद लोग इस विषय में बात करने लगे तथा लोगों ने हमें और कई मुद्दों पर फिल्म बनाने को भी कहा, हमारे लिए यही काफी है।”

यह टीम अभी अपने नए फिल्म पर काम कर रही है, जो कि शौचालय के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता लाने पर है। बातचीत के दौरान टीम के एक सदस्य विकी पवार ने बताया की “हमारे गांव में सरकार की तरफ से हर किसी को शौचालय बना कर दिया गया है मगर लोग उसका सही इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, हमारी अगली फिल्म इसी विषय को लेकर है।”

https://www.youtube.com/watch?v=4_k3ktSCfXo

इन युवाओं के उत्साह को देखते हुए अब इनके साथ गांव के बुजूर्ग भी इनकी मदद को आ रहे हैं। शौचालय विषय पर बन रही इनकी फिल्म में मुख्य पात्र गांव के एक सेवानिवृत्त प्राचार्य बी के पावरा निभा रहे हैं। यह टीम आने वाले दिनों में गुटखा के इस्तेमाल पर रोक, बाल विवाह तथा सिकल सेल बीमारी के ऊपर भी फिल्म बनाने वाली है। लघु फिल्मों के माध्यम से लोगों में समाज में जागरूकता लाने के विषय में बात करने पर नितेश ने बताया कि “क्यूंकि ये फ़िल्में पूरी तरह से यहीं के लोगों के द्वारा बनाई जा रही है, देखने वाले इन फिल्मों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। आज की हमारी मीडिया तथा फ़िल्में शहरी इलाकों की बातें करती हैं, ऐसे में इस तरह का प्रयास लोगों में सामाजिक समस्याओं पर जागरूकता लाने का काम जरुर करेगी।”

मायानगरी मुंबई से 500 किलोमीटर दूर यह तालुका भले ही अपनी फिल्मों को यू-ट्युब पर लाखों दर्शक ना दिला सके। मगर इन युवाओं की बिना किसी लागत की बनी ये मोबाइल फ़िल्में उन तमाम धारणाओं को धराशाई कर रहा है जो ये कहती है की फिल्म बनाना सिर्फ बड़े लोगों का काम है। ये युवा इन फिल्मों के माध्यम से ना सिर्फ सामाजिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि फिल्मों में काम करने का अपना सपना भी पूरा कर रहे हैं जो इनके लिए शायद हमेशा सपना ही रहता। एक ऐसा इलाका जहां आज भी कई जगहों पर मोबाइल नेटवर्क नहीं है वहां पर इस तरह के प्रयास वाकई सराहनीय है।

पूजिता सिंह

लेखक के विषय में:
पूजिता सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दों पर लिखती रहती हैं। वर्तमान में वे लोकसभा में इंटर्नशिप कर रही हैं और रसायन व उर्वरक मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति से सम्बन्ध हैं।

 

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