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पहली शिक्षिका सावित्री बाई फूले से आज के शिक्षक क्या सीखें?

जब शिक्षा ही बाजारू वस्तु बन जाए तो शिक्षक का वस्तुकरण से बचे रहना आसान है क्या? उच्च शिक्षा हो या स्कूली शिक्षा दोनों नवउदारवादी सरकारी नीतियों के बलि चढ़ाएं जा रहे हैं।”प्रो . मायरन वीनर के अध्ययन के मुताबिक …सन 1986 की शिक्षा नीति को स्कूली शिक्षा व्यवस्था के अंदर और उसके ज़रिये समाज में गैर-बराबरी फैलानेवाली सामानांतर परतों की नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत माना जा सकता है।” मसलन यह ज़ाहिर था “की नवउदारवाद के प्रमुख एजेंट के रूप में विश्व बैंक का मकसद भारत की विशाल सरकारी स्कूल व्यवस्था की गुणवड्ता में इतनी गिरावट लाना था की आम जनता में उसकी विश्वसनीयता खतम हो जाए।” (शिक्षा का अधिकार छीने वाला बिल, डॉक्टर अनिल सदगोपाल, 2009)

आज की परस्थितियाँ जिसपर सब बेहाल होकर डर के माहौल में जीने की कोशिश कर रहे हैं, उन परिस्थितियों की नीव देश की पुरानी सरकार और मौजूदा सरकार की सांठगांठ से ही हुई थी।”शिक्षा के साम्प्रदायिकरण के कार्यकम का मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज पर ब्रह्माण्डवादी और पुरुषवादी विक्चारधारा का वर्चस्व स्थापित करना था”।

लेकिन देश के अधिकतम मध्यम वर्गी लोग जो इन नीतियों का थोड़ा बहुत सुख भोग पा रहे हैं वह समाज के एक बड़े तपके मज़दूर, आदिवासी, छोटा किसान, निम्न मध्यम वर्ग, दलित, महिला, और अल्पसंख्यक समुदायों की कब्र पर पैर रखकर विकास का सपना देख रहे हैं।”लेकिन देश की (मेहनतकश) जनता ने समझ लिया है की संघ परिवार जब ‘भारतीयकरण’ कहता है तो उसका अर्थ है ‘हिन्दुत्ववादीकरण’ जब वह ‘राष्ट्रीयकरण’ कहता है तो उसका आशय है ‘ब्रामणवादीकरण’ और जब ‘अध्यातिमीकरण’ की बात की जाती है तो उसका आशय गैर-बराबरी, दमन और शोषण जैसी सच्चाइयों पर पर्दा डालने वाले पाठ्यक्रम बनाने से होता है ताकि ‘पलायनवादीकरण’ की सोच शिक्षा पर हावी हो जाए। यही असली निहितार्थ है संघ परिवार के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ‘ का “। (शिक्षा का अधिकार छीने वाला बिल, डॉक्टर अनिल सदगोपाल, 2009)

इस षड्यंत्र को जमीन पे उतारने के लिए “साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के साथ कारपोरेट जिम्मेदारी का शगूफा तेजी से उठाया गया।साम्राज्यवादी नीति पर चलते हुए इस पर जोर देकर पूरे देश में एनजीओ का नेटवर्क बना जो एकतरफ सरकार की ज़िम्मेदारी उठाने का दावा कर रहे थे तो दूसरी ओर जनता के बीच बन रहे प्रतिरोध (सेफ्टी वाल्व ) भी बन रहे थे “। एक तरफ सरकारें शिक्षा का फण्ड काटती गयी और दूसरी तरफ “ये ‘नो पॉलिटिक्स’ के नारे के साथ मध्यवर्गीय समाज की चिंता और गरीब लोगों को अनुग्रहित करने की राजनीती को बढ़ावा दे रहे थे। सरकार ने खुलेआम इसी राजनीती को पीपीपी की नीति के तहत सूत्रबद्ध कर इसे जमीनी स्तर पर लागू करने का रास्ता खोल दिया।” (स्कूलों का एनजीओकरण, लोक शिक्षक मंच, 2013)

इस परिवेश में शिक्षकों, छात्रों, मज़दूर, महिलाओं की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है वो इस तबाही को पुरजोर ताकत के साथ इस ब्राह्मणवादी और सम्राज्यवादी ढांचे को उखाड़ फेंके और साथ ही साथ जनता का देश के हर कोने में चल रहे संघर्षों और समानता के ढांचे की नीव को मजबूत कर के आगे बढ़ाएं।परन्तु आज का शिक्षकगण जोतिबा फुले, सावित्री बाई फूले के दिखाए गए रास्ते पर चलने को तो छोड़ो, वह उनके ही तलवे चाट कर जिन्होंने उन्हें सदियों से गुलामगिरी करवाई है उनके सामने एक सरकारी नौकरी की चाहत में अपने संघर्षशील और संघर्ष करने वालों को नाम के लिए भी याद नहीं करता जिनके सदियों से चलते संघर्ष के बदौलत वो खुद यहाँ तक पहुँच पाये हैं।

चलिए आज की इस डिजिटल पीड़ी को याद दिलाएं के गुलामगिरी ख़तम करने के लिए हमारे देश के पहले शिक्षकों ने क्या योगदान दिया और क्या संघर्ष झेलते हुए अपनी क्रन्तिकारी विचारधारा को आगे बढ़ाया। जोतिबा और सावित्री बाई फूले देश के पहले शिक्षक हैं और उनकी जन्मतिथि को आम जनता शिक्षक दिवस के रूप में मनाती है।यह ब्राह्मणवादीयो द्वारा स्थापित राधाकृष्णन की विरासत को इतिहासिक ढंग से खंडित और नकारता है।जोतिबा और सावित्री बाई,पंडिता रमाबाई, बेगम रूक्या, मुहम्मद शिब्ली नोमानी और अन्य ऐसे क्रांतिवीर जिनको भुलाया जा रहा है उनसे हमे प्रेरणा और ऊर्जा लेनी की सख्त ज़रुरत है।

“जोतिबा फूले के लिए शिक्षा का अर्थ केवल शिक्षित या साक्षर होने तक नहीं था, बल्कि यह सामाजिक बदलाव का माधयम था।उत्पीड़ितों की शिक्षा की दिशा में उनके द्वारा किये गए कार्यों ने आगे आने वाली पीडियों को एक रास्ता दिखाया।बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें अपना गुरु माना।महिलाओं और दलितों की शिक्षा की वकालत करना उस समय के दौर में क्रन्तिकारी कदम था।सावित्रीबाई के शिक्षा दर्शन के केंद्र में था ‘समाज सुधार’।उनका मानना था की असली ज्ञान वेदों या ब्रामणिक ग्रंथो में नहीं, बल्कि ज्ञान तो वर्चस्व तोड़ने की नीति है।एक ऐसी शिक्षा जो उत्पीड़न के स्त्रोत को समझकर बदलाव के रास्ते खोजना सिखाये, साथ ही पुरुष-महिला संबंधों में बराबरी सिखाये।” (हमारे शिक्षक, लोक शिक्षक मंच, 2016)

आधुनिक शिक्षाशस्त्र और इतिहास की यह गाथाएं, इन लोकतांत्रिक विचार पर भी अगर आज के शिक्षक चलें तो बहुत सारी और मेहनतकश संघर्ष कर रही जनता को भी ऊर्जा मिलेगी।और यह ऊर्जा का असर दोनों ओर से एक दूसरे को साथ साथ गैरजनतांत्रिक ताकतों को हराने में एक ऐतिहासिक रूप लेगा और छात्र पीड़ी का सही मार्गदर्शक बनेगा।

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