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जेल में काटे बेगुनाही के 14 साल, क्या मोहम्मद आमिर को मिली मुसलमान होने की सजा?

साल 1998 में दिल्ली पुलिस सीरियल बम बलास्ट के मामलों में मोहम्मद आमिर खान को आरोपी बनाया था, लेकिन उन्हें खुद को निर्दोष साबित करने के लिए चौदह साल का लंबा संघर्ष झेलना पड़ा। कोर्ट ने उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया है। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश पर दिल्ली पुलिस को पांच लाख रुपये मुआवजा देना पड़ा है।

बीबीसी से बातचीत में आमिर ने कहा, मैं फरवरी 1998 की वो रात नहीं भूल सकता जिसने मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। मेरे घर के पास ही एक सुनसान रोड पर एक जिप्सी रुकी और कुछ लोग मेरे हाथ-पैर बांध कर, आंखों पर पट्टी बांध कर गाड़ी में डाल कर ले गए। सब लोग सिविल ड्रेस में थे। मुझे लगा कि मुझे अगवा किया गया है। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि ये पुलिस वाले हो सकते हैं।”

आमिर ने आगे कहा, ”मुझे एक कमरे में ले जाकर खड़ा कर दिया, मेरे सारे कपड़े उतार दिए गए और टॉर्चर का सिलसिला शुरू हुआ। 7 दिन तक मुझे गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा। उसके बाद मेरे पास 100-150 पेपर लेकर आए और जबरन दस्तख्त कराने की कोशिश की। इतने दिन के टॉर्चर के बाद भी मैंने विरोध किया। लेकिन नतीजा ये हुआ कि मेरे हाथ-पैर के नाखून तक निकाल लिए गए और मजबूरन मुझे साइन करना पड़ा। 1996-97 में दिल्ली-एनसीआर में जो ब्लास्ट हुए थे, उन सबमें मुझे दोषी बनाया गया था। तब मैं सिर्फ 18 साल का था।”

आमिर आगे कहते हैं कि मैं कभी नहीं कहता कि मेरी गिरफ्तारी हुई थी। गिरफ्तारी उसको कहते हैं जब कानून के तहत किसी को पकड़ा जाए, किसी राह चलते को उठा लेना गिरफ्तारी नहीं होती। इस ‘अपहरण’ से पहले मैं पुरानी दिल्ली के एक हंसते-खेलते परिवार का लड़का था। पायलट बनने के ख्वाब देखता था। 14 साल जेल काटने के बाद घर लौटा तो पिता जी नहीं थे। इस दौरान उनकी मौत हो गई थी। उनको आखिरी बार देखने के लिए पेरोल या जमानत तक नहीं मिली थी।

वे आगे बताते हैं, कब्रिस्तान जाता हूं तो मुझे ये भी नहीं पता कि उनको दफनाया कहां गया है। बस एक कोने में खड़ा होकर उनके लिए दुआ मांगता हूं। मेरी मां पेरालिसिस का शिकार हो चुकी थी। इस हालत में थीं कि मुझे देखकर ‘बेटा’ तक नहीं बोल पाईं। परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा। आखिर एक ‘देशद्रोही’ के परिवार से कौन संबंध रखना चाहेगा। कोई भी ऐसे घर जाने से बचेगा जिससे उसे थाने का दरवाजा देखना पड़े।

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