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सवर्णों के मोहल्ले से बारात नहीं निकलवा पा रही पुलिस, दलितों को इसलिए चाहिए कड़ा कानून

लखनऊ. सुप्रीम कोर्ट ने हालिया मामले में एससी/एसटी एक्ट में संशोधन किया है. इस संशोधन ने दलित एट्रोसिटी एक्ट को कमजोर कर दिया है. इसे लेकर दलितों ने 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया. इस दौरान बाहरी समाज के अराजक तत्वों द्वारा हिंसा फैलाई गई. इसमें मारे गए सभी लोग दलित हैं लेकिन मीडिया द्वारा इस तरह प्रसारित किया गया जैसे कि दलितों ने खुद पर ही गोलियां चलाई हों. भारत बंद के बाद से एक सवाल मेनस्ट्रीम मीडिया को खाए जा रहा है कि आखिर एक्ट में संशोधन से क्या हानि है? इसका जवाब ताजा मामले से ही जान सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में दलित युवक सवर्णों के घरों के सामने वाले रास्ते से बारात निकालना चाहता है. वह पिछले कई महीनों से कानूनी मदद ले रहा है और न्यायालय की शरण में भी जा चुका है. वहां के सवर्णों को इस बात का गुमान है कि उनके रास्ते से कोई दलित घोड़ी पर सवार होकर कैसे निकल सकता है. दलित युवक खुद को भारत का नागरिक मानता है लेकिन सवर्ण उसे तुच्छ मान रहे हैं. ऐसे में पुलिस प्रशासन ने नया तरीका निकाला है.

पुलिस घोषित तौर पर तो युवक की बारात निकलवाने से इंकार नहीं कर सकती क्योंकि वह युवक खुद को इसी देश का नागरिक बता रहा है और उसे संविधान और न्यायपालिका से इंसाफ मिलने की उम्मीद है. ऐसे में पुलिस मनुवादी सवर्णों को भी नाराज नहीं कर सकती क्योंकि उनके नाराज होने से विपत्ति आना संभव है. अब पुलिस ने दलित युवक को बारात निकालने के लिए अनुमति देकर पुलिस प्रशासन ने इसके लिए मैप भी बनाया है.

बता दें कि दलित युवक संजय कुमार काफी समय से शादी के दौरान घोड़ी से बारात निकालने की अनुमति मांग रहे है. इसके समाधान के लिए ही जिला प्रशासन और पुलिस ने लंबा और घुमावदार रास्ते का रूट तैयार कर इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर किया है.

यूपी के हाथरस जिले के संजय कुमार और शीतल की शादी कासगंज के निजामपुर गांव में 20 अप्रैल को होनी है. इसके लिए संजय कुमार ने स्थानीय पुलिस से संपर्क कर बारात निकालने की अनुमति मांगी थी, लेकिन पुलिस ने अनुमति देने से मना कर दिया था. पुलिस ने कहा कि वह इलाका उच्च जाति के लोगों का है, उनके बारात निकाले जाने से वहां हिंसा हो सकती है. यही नहीं 21 मार्च को कासगंज पुलिस और प्रशासन ने संजय को बारात निकालने के लिए 800 मीटर लंबे रास्ते का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया था.

गांव में आज तक नहीं निकली दलितों की बारात
दरअसल जिस इलाके में युवती का घर है, उस इलाके में 40 दलितों के घर हैं जबकि 300 उच्च जाति के लोग रहते हैं. हैरानी की बात यह है कि जिस गांव में बारात जानी है, वहां आज तक दलितों की बारात नहीं निकाली गई. लड़के के घरवालों ने निजामपुर गांव के समुदाय के लड़की के घर से करीब 80 मी दूर एक खुले मैदान में शादी समारोह कराने के फैसले पर भी ऐतराज जताया था. उनका कहना था कि यहां उन्हें हर्षोउल्लास की ठीक जगह नहीं मिल पाएगी.

इसके बाद संजय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की. अपनी याचिका में उसने कहा था कि वह घोड़ी पर चढ़कर अपनी बारात ले जाना चाहता है लेकिन इलाके में रहने वाले उच्च जाति के लोग इसका विरोध कर रहे हैं. साथ ही उसे बारात निकालने के लिए विशेष मार्ग बताया जा रहा है. प्रशासन को मेरी मदद करनी चाहिए क्योंकि मैं भारत का नागरिक हूं. हालांकि कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया. उधर कासगंज प्रशासन ने दोनों समुदाय के 10 प्रतिनिधित्वों को बुलाकर तालमेल बनाए रखने के लिए एक बॉन्ड साइन करवाया.

साभार- सबरंग इंडिया

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