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मनुस्मृति दहन दिवस: किताबों को सबसे ज्यादा प्यार करने वाले बाबासाहेब ने क्यों जलाई मनुस्मृति?

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आज से ठीक 90 साल पहले 25 दिसंबर 1927 को बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने रात्रि के 9 बजे हिन्दू भारत का तानाबाना बुनने वाली मनुस्मृति-मनु के कानून के दहन संस्कार का नेतृत्व किया था। इसीलिए 25 दिसंबर को ‘मनुस्मृति दहन दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है, जिसे स्त्रीवादियों का एक समूह ‘ भारतीय महिला दिवस’ के रूप में मनाने का आग्रह भी रखता रहा है।

बाबासाहेब ने उस दिन अंधेरे आकाश में उजाला फैला दिया था। कुछ लोगों का कहना है कि बाबासाहेब ने ब्राम्हणों की इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से नष्ट करने का निर्णय आखिरी क्षणों में लिया था, यह जल्दी में किया गया फैसला था। कुछ लोग इसे अम्बेडकर के जीवन की गैर-महत्वपूर्ण घटना भी बताते हैं। लेकिन इन बातों में कोई दम नहीं है। यह कार्यक्रम नए साल की पूर्व संध्या पर जलाई जाने वाली बॉनफायर था, जिसमें एक बूढ़े व्यक्ति का पुतला जलाया जाता है।

यह बूढ़ा व्यक्ति प्रतीत होता है पुराने साल का जो नए साल को जगह दे रहा है। सन् 1938 में डॉ. आम्बेडकर ने टीवी परवटे को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था मनुस्मृति दहन हमने जानबूझकर किया था। हमने यह इसलिए किया था क्योंकि हम मनुस्मृति को उस अन्याय का प्रतीक मानते हैं जो सदियों से हमारे साथ हो रहा है। उसकी शिक्षाओं के कारण हमें घोर गरीबी में जीना पड़ रहा है। इसलिए हमने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, अपनी जान हथेली पर रखकर यह काम किया।

उस इतिहास निर्मात्री क्रिसमस की रात सभी कार्यकर्ताओं ने पांच संकल्प लिए गए-
1. मैं जन्म-आधारित चतुर्वर्ण में विश्वास नहीं रखता।
2. मैं जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखता।
3. मैं विश्वास करता हूं की अछूत प्रथा, हिन्दू धर्म का कलंक है और मैं अपनी पूरी ईमानदारी और क्षमता से उसे समूल नष्ट करने की कोशिश करूंगा।
4. यह मानते हुए की कोई छोटा-बड़ा नहीं है, मैं खानपान के मामले में, कम से कम हिन्दुओं के बीच, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करूंगा।
5. मैं विश्वास करता हूँ की मंदिरों, पानी के स़्त्रोतों, स्कूलों और अन्य सुविधाओं पर बराबर का अधिकार है।

छ: लोगों ने दो दिन की मेहनत से सभा के लिए पंडाल बनाया था। पंडाल के नीचे गडढा खोदा गया था, जिसकी गहराई छह इंच थी और लम्बाई व चौड़ाई डेढ़-डेढ़ फीट। इसमें चंदन की लकड़ी के टुकड़े भरे हुए थे। गड्ढे के चारों कोनों पर खंभे गाड़े गए थे। तीन ओर बैनर टंगे थे। क्रिसमस कार्ड की तरह झूल रहे इन बैनरों पर लिखा था-

– मनुस्मृति दहन भूमि।
– ब्राहम्णवाद को दफनाओ।
– छुआछूत को नष्ट करो।

वे क्या सोच रहे थे? उस समय डा. आम्बेडकर के दिमाग में क्या चल रहा था? सन् 1927 का वह 25 दिसंबर भारत के लिए आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?
अम्बेडकर के लिए स्मृति साहित्य और विशेषकर मनुस्मृति…जन्म न की योग्यता को व्यक्ति की समाज में भूमिका का निर्धारक बनाता था, शूद्रों को गुलामों का दर्जा देता था और महिलाओं को गुमनामी की जिंदगी देता था।

मनुस्मृति शूद्रों-अतिशूद्रों के साथ-साथ स्त्रियों को भी अपने विधानों का शिकार बनाता है। मनुस्मृति से मुक्ति स्त्री की मुक्ति के लिए भी एक पहल है, जिसकी शुरुआत 25 दिसंबर 1927 को डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति के दहन के साथ की थी। डॉ. अम्बेडकर ने अपने आलेख ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘ में स्त्रियों की दुर्दशा का विधान रचाते मनु स्मृति की खबर ली है। हम आज मनुस्मृति दहन दिवस के अवसर पर इस आलेख का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं…

मनुवादी अथवा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अधीन मनु स्मृति प्रमाणित करती है कि भारत का समस्त पिछड़ा वर्ग एवं अछूत वर्ग शूद्र और अतिशूद्र कहलाता है जैसे कि तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कल्हार, बढई, नाई, ग्वाल, बनिया, किरात, कायस्थ, भंगी, सुनार इत्यादि। मनुस्मृति में उक्त शूद्रों के लिए मनु द्वारा उच्च संस्कारी कानून बनाए गए हैं जिसके द्वारा बरगलाया गया है कि इसको पढ़ कर उनका अनुसरण करने से उक्त समाज के सभी लोगों का उद्धार हो जायेगा और हमारा भारत पुनः सोने की चिड़िया बन जायेगा..

आखिर क्या लिखा है मनुस्मृति में-
–जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो, उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नहीं है।
–राजा प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें।
–जिस राजा के यहाँ शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है।
–ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है।
–नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊंचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे।
–ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है। इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है, उसका कर्म निष्फल होता है।
–यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए , क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।
–यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है , जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है, तब दश अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए।
–निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए, तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए।
–ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है, वह है गुणगान करते हुए ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना।
–शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे, तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगबा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे।
–यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे तब राजा दोनों ओंठों पर पेशाब कर दे तब उसके लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे।
–यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए।
–इस पृथ्वी पर ब्राह्मण वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी न लाए।
–शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें।
–राजा बड़ी बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री, गृह शय्या, वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे।
–जानबूझ कर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है, वह 21 जन्मों तक कुत्ते बिल्ली आदि पापश्रेणियों में जन्म लेता है।
–ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है।
–शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए।
–बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है।
–शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते। गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें।
–ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन लेवे क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है। उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है।
–धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है।
–राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं।
–शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है। मुर्दों से उतरे हुए कपड़े इनके वस्त्र हैं। शूद्र टूटे फूटे बर्तनों में भोजन करें। शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहने।
–यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए।
–दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित, चाण्डाल, मूर्ख, धोबी आदि अंत्यवासी हो उनके साथ द्विज न रहें। लोहार, निषाद, नट, गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है।
–शूद्रों के समय कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में कोई सम्बन्ध नही रखें, चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।
–स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है। अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है।
–अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर ब्राह्मण उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराये।
–शूद्रों को बुद्धि नही देना चाहिए अर्थात उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही है। शूद्रों को धर्म और व्रत का उपदेश न करें।
–जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।
–शूद्र की उपस्थिति में वेद पाठ नही करना चाहिए। ब्राह्मण का नाम शुभ और आदर सूचक, क्षत्रिय का नाम वीरता सूचक, वैश्य का नाम सम्पत्ति सूचक और शूद्र का नाम तिरस्कार सूचक हो।
–दस वर्ष के ब्राह्मण को 90 वर्ष का क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पिता समान समझ कर उसे प्रणाम करे।

मनु के उपवर्णित विधानों से अनुमान लगाया जा सकता है कि शूद्रों-अतिशूद्रों पर किस प्रकार और कितने अमानवीय अत्याचार हुए हैं। इस प्रकार के क्रूर और रोंगटे खड़े कर देने वाले विधान लिखे गए हैं। मनु के इन अमानवीय विधानों से भारत का हाथी जैसा मूल निवासी बहुसंख्यक समाज मानव होते हुए भी पशु के समान जीवन जीने को मजबूर हो गया। मनु के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण शूद्र और अतिशूद्र समाज मरे हुए जानवरों के सड़े से सड़े मांस को नोचकर खाने को मजबूर हो गए। मनु द्वारा ब्राह्मणों को दिए गए विशेषाधिकारों ने ब्राह्मणों में शूद्रों और अछूतों के प्रति निर्ममता और अमानवीयता का भाव भर दिया।

मनुविधान में वर्णित मूर्ख, गवांर और कुकर्मी ब्राह्मण भी मूल निवासियों पर आधिपत्य स्थापित कर उन्हें जीवन भर गुलाम बनाने के लिए उनको कई हजार जातियों में बांटा। ब्राह्मणों ने मूल निवासियों को न केवल जातियों में विभक्त किया बल्कि उनमें ऊंच-नीच का भेद-भाव भी पैदा किया ताकि इन जातियों में आपस में फ़ूट रहे और वे उन पर राज करते रहें। महामानव महान सामाजिक क्रांतिकारी ज्योतिराव फुले का कहना था, अंग्रेजों और मुसलमानों ने तो हमारे शरीर को ही गुलाम बनाया परन्तु ब्राह्मणों ने तो हमारी चेतना को ही गुलाम बना डाला।

इस प्रकार मनु के विधान के फलस्वरुप समाज में जातिवाद, ऊंच-नीच, छुआछूत, पैतृक-पौरोहिताई, वर्णवाद, कर्मकाण्ड का वातावरण फ़ैल गया। इससे केवल ब्राह्मणों को ही लाभ हुआ तथा शूद्रों का घोर अहित हुआ। उनमें हीनता का भाव पनप गया। ब्राह्मणों द्वारा भाग्यवाद, पुनर्जन्मवाद और ईश्वरवाद के बिछाये जाल में फंस कर बहुजन अपने मान और सम्मान के प्रति संवेदना ही नष्ट कर बैठे। उनमें एक अच्छा इंसान बनने की चाहत समाप्त हो गई। यह सब मनु द्वारा रचित मनुस्मृति के कारण हुआ।

मनुवाद विध्वंसक, अपराधिक प्रवृत्ति युक्त, असमानता पर आधारित, लालची एवं स्वार्थी मनोवृत्ति वाला, हिंसक एवं बेईमान, क्रूर, उत्पीड़क, निकम्मा तथा दूसरों का घातक शत्रु है। इस व्यवस्था ने इस देश के मूल निवासियों को शूद्र और अतिशूद्र बना कर उन्हें लम्बे अरसे तक जानवर की जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर किया। मनुवाद हमेशा समाज को दिग्भ्रमित करता है तथा बहकाता है। यह बहुजनों और महिलाओं को हमेशा हतोत्साहित करता है।

यह घोर भौतिकवादी और अवसरवादी है। बहुजन समाज की उन्नति और मुक्ति के लिए मनुवाद को पुनः दफनाने की जरूरत है। क्या हिन्दुवादी अर्थात ब्राह्मणवादी लोग ये बताने का कष्ट करेंगे कि उपरयुक्त् मनु के क्रूर विचारों और विधानों से क्या पिछड़े वर्ग के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत नही होती हैं? क्या उनको अपने देश में एक सम्मान और मौलिक अधिकारों के साथ जीने का अधिकार नही है? क्या इससे हिन्दू धर्म की आस्था को ठेस नही पहुंचती है? क्या विचार धारा से हिंदुओं में फ़ूट उत्पन्न नही होती है?

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