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सुहेल सेठ से नाबालिग के साथ उत्पीड़न और मायावती के खिलाफ आपत्तिजनक ट्वीट पर प्रश्न क्यूँ नहीं किया जाना चाहिए?

Suhel Seth Mayawati

#MeToo मूवमेंट अभी पढ़े लिखे संभ्रांत तबके तक सीमित हो सकता है लेकिन क्या हम हमेशा ये कहते हुए नही दिखते कि पढ़ी लिखी औरतें ये सब क्यू झेलती है? जब ये अपनी आवाज़ नही उठाएँगी तो गाँव और क़स्बों की उन औरतों को कैसे उम्मीद दी जा सकती है जिनके पास ना तो साधन है ना जागरूकता। और आज जब पढ़ी लिखी संभ्रांत औरतें आवाज़ उठा रही है तो उसेइलीटिस्ट मूवमेंटबताकर ख़त्म करने की कोशिश क्यूँ की जा रही हैं?

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उत्पीड़न जहाँ कहीं भी हो उसका विरोध होना ही चाहिए। गाँव और क़स्बों में क्या होता है ये तो आप सब जानते है। एक मुस्लिम लड़की को उसके परिवार ने किस बेदर्दी से पीटा? ये खबर जरूर बाहर आनी चाहिए और इस पर आवाज उठायी जानी चाहिए, लेकिन सुहेल सेठ ने एक नाबालिग के साथ उत्पीड़न किया इस पर प्रश्न क्यों न किया जाए?

इस पर प्रश्न क्यों न किया जाए की सुहेल सेठ किस तरह अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का फायदा मायावती, ममता बनर्जी और जयललिता के खिलाफ आपत्तिजनक ट्वीट करने के लिए उठाते है।

इस ट्वीट के जरिये सुहेल सेठ ये बता रहे है कि किसी रेस्टॉरेंट में इतना घटिया खाना मिलता है कि वहां तभी जाए जब आप आत्महत्या करना चाहते हो या आपको मायावती ने प्रोपोज़ किया हो? इस ट्वीट का क्या अर्थ है की मायावती का प्रोपोज़ करना किसी व्यक्ति के लिए आत्महत्या करने जैसा है? क्या यह मायावती के रंग-रूप पर एक भद्दी टिपण्णी है? और यह केवल एक ट्वीट नही है, इस प्रकार की भद्दी टिप्पणियां सुहेल सेठ के द्वारा बार बार की गयी है।

Suhel Seth Tweets on Mayawati's Looks

इस ट्वीट से सुहेल सेठ बता रहे है कि खाप पंचायत को रोकने का एकमात्र तरीका है कि उनको जेल में बंद कर थप्पड़ मारे जाये और अंत में उन्हें मायावती से जबरन ‘मिलाया’ जाये। इस ट्वीट के कई मतलब हो सकते है। और मायावती तथा अन्य मुखर, स्वतंत्र एवं सशक्त राजनैतिक महिलाओ के लिए जिस प्रकार के इनके विचार है उस से तो यह ट्वीट निहायत ही घटिया मतलब की तरफ इशारा करती है।

इस ट्वीट के जरिये क्या सुहेल सेठ दलितों के प्रति अपनी सवेंदन हीनता का परिचय नहीं दे रहे है? क्यूंकि किसी दलित औरत को बलपूर्वक सर मुंडवाने के लिए कहना क्या दलितों के गले में हांडी बांधना और कमर पर झाड़ू बांधना तथा उनको जातिसूचक शब्द बोलने जैसा नहीं है? क्या दलित औरतों को डायन बताकर उनका सर मुंडवाने की प्रथा आज भी देखने को नहीं मिलती?

Suhel Seth Karva Chauth

मदर्स दे और करवाचौथ पर की गयी सुहेल सेठ की यह ट्वीट क्या एक बेहद सेक्सिस्ट कमेंट नहीं ह? क्या यह उन सामाजिक तानो जैसा नहीं है जो औरत की सम्पूर्णता केवल शादी करने और बच्चे पैदा करने में ही मानते है और जो महत्वकांक्षी और सफल औरतों को इस तरह के ताने देकर उन्हें रूढ़ीवादी छवि की तरफ घसीटना चाहते है।

इन ट्वीट्स से सुहेल सेठ का तात्पर्य क्या है ? क्या इस प्रकार की भाषा का प्रयोग किसी औरत, एक बड़ी राजनैतिक पार्टी की नेत्री के लिए करना आपत्तिजनक नहीं है? आखिर क्यों इस पर सवाल न किये जाए? क्या ये ट्रोलिंग नहीं है? इस तरह के घटिया ट्वीट्स से सुहेल सेठ की किस प्रकार की मानसिकता जाहिर होती है? क्या औरतों को इज्जत देने में भी सुहेल सेठ चेरी पीकिंग करते है?

आखिर इस एलिटिस्ट सोसाइटी की गन्दगी बाहर क्यों नहीं आनी चाहिए? क्या ये ज्यादा खतरनाक नहीं है कि उन बड़े बंगलो और होटलो की बड़ी खिड़कियों के पीछे औरतों के साथ जो घटित हो रहा है वो रिपोर्ट तक नहीं होता? क्या इसलिए क्यूंकि ये संभ्रांत लोग कैमरा और कलम से बचना जानते है या यूँ कहे की इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना जानते है? क्या वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह का अपने मित्र सुहेल सेठ के पक्ष में ट्वीट करना और कॉलम लिखना उनका बचाव करना नहीं है? और क्या तवलीन सिंह का पीड़ित के चरित्र पर सवाल खड़ा करना विक्टिम शेमिंग नहीं है?

Tavleen Singh Suhel Seth Tweet

2 Comments

2 Comments

  1. सही है ये तथाकथित बड़े लोग ही घृणित हरकतें करते हैं और अपनी पहुंच के कारण बचे हैं
    MeToo

  2. Antaram meghwL sardarshahar

    October 15, 2018 at 1:34 pm

    साला कुत्ते का बीज है सुहेल सेठ इन जैसे लोगों कि वजह से ही देश में नफरत फैलती है ।indain gay suhel seth dog

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