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जब सड़कों पर दलित-पिछड़ों ने दिखाया दम तो RSS भी देने लगा सफाई

दलित भाईयों के द्वारा उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरुद्ध भारत बंद से देश की सभी भाजपा सरकारें, केन्द्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सकते में है। सभी बैकफुट पर हैं, केन्द्र सरकार तुरंत पुनर्विचार याचिका लेकर पंडिज्जी के पास पहुंची तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तुरंत सफाई दी कि अदालत के इस फैसले से उसका कोई लेना देना नहीं है, हालाँकि संघ सदैव की तरह झूठ ही बोल रहा है।

बिना किसी पूर्व तैय्यारी, बिना किसी बैनर के, बिना किसी राजनैतिक दल के आह्वान के स्वतः ही पूरे देश में दलितों द्वारा किया गया सफल “भारत बंद” यह दिखाता है कि दलित अपने हक और अधिकार के लिए कितने जागरूक हैं और अचानक किए एक आह्वान पर वह देश को हिला सकते हैं।

दलितों की इस एकता के लिए उनको “सलाम”

हालाँकि भारी पैमाने पर हिंसा हुई जो कि नहीं होनी चाहिए थी, यह निंदनीय है परन्तु यही दलित जब दंगों में मुसलमानों के जान माल पर हमला करते हुए ऐसी ही हिंसा करते हैं तब दंगों के कारण उपजी फसल काटने संघ और भाजपा जिस तरह वोट बटोरने के लिए तत्पर रहते हैं वह कल से बैकफुट पर हैं और दलित वोटरों के कुछ प्रतिशत वोटों को बचाने के लिए मिमिया रहे हैं।

केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह झूठ बोल रही है कि एससी/एसटी ऐक्ट पर उच्चतम न्यायालय के आए इस फैसले से उसका कोई संबन्ध नहीं है, इस मुकदमें के संदर्भ में केन्द्र सरकार का कमजोर पक्ष ही इस फैसले के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार है, और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पूर्व वकील और अब उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश यू यू ललित इसी लिए भाजपा सरकार बनते ही न्यायधीश बनाए गये हैं कि भगवा एजेन्डे को उच्चतम न्यायालय के माध्यम से देश में लागू किया जाए।

इस मुकदमें में एटार्नी जनरल का जानबूझ कर दिया कमजोर पक्ष और न्यायधीश यू यू ललित की वफादारी ने एस/एसटी ऐक्ट को साजिश करके कमज़ोर किया।

यह फैसला पूरी तरह केन्द्र सरकार और न्यायपालिका की मित्रता के कारण हुई सेटिंग का परिणाम है, अब जब दलितों ने डंडा कर दिया तो चारों तरफ से सफाईयाँ आने लगी हैं।

उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायधीश जस्टिस जे चेलामेश्वर समेत चार जजों की जनता में आकर महत्वपूर्ण मुकदमों को मनपसंद बेंच में भेजने के पंडिज्जी के कृत और अभी न्यायपालिका और कार्यपालिका की गहराई दोस्ती को लोकतंत्र के लिए घातक बताने वाले संदर्भ में इस फैसले की समीक्षा करिए तो संघ और सरकार की सारी साजिश सामने आ जाएगी।

खैर, दलित इतनी जल्दी मानने वाले नहीं, वह अपने अधिकार के लिए किसी के भी बाँस कर सकते हैं परन्तु आज के हालात में क्या यही मुसलमान कर सकता है ?

नहीं, और करना भी नहीं चाहिए, मुसलमानों के लिए फिलहाल सबसे बेहतर विकल्प यह है कि वह चुपचाप शांति से खामोश बैठें, शिक्षा रोजगार और कारोबार पर ध्यान दें, संघ और भाजपा का काम तमाम तो शेष हिन्दू भाई ही कर देंगे, मुसलमानों की ऐसी प्रतिक्रिया या तीखे उत्तेजक और भड़काऊ बयान संघ और भाजपा को मज़बूत करती हैं और वह मुसलमानों द्वारा किए ऐसी किसी घटना से अपने नाराज़ वोटरों को प्रोवोक करके ध्रुविकरण करा ले जाते हैं।

आज के भारत के राजनैतिक और सामाजिक वातावरण में मुसलमान यह समझ ले कि युद्ध या शतरंज के खेल में जब वज़ीर नहीं होता तो सुरक्षात्मक खेल खेलना होता है और अपने बचे मोहरों और सैनिकों को बचाकर बाजी पलटने की कोशिश की जाती है।

सुरक्षात्मक खेल खेलना, कायरता नहीं बहादुरी है, इसमें सब्र है, साहस है, और समय के इंतज़ार करके बाजी अपने पक्ष में करने की रणनीति होती है।

चुपचाप बस इंतज़ार करिए, भाजपा और संघ को मिल रहा दलितों का समर्थन एससी/एसटी ऐक्ट में छेड़छाड़ करने से अब जा चुका है, शेष लोग भी ऐसे ही किसी मुद्दे पर चले जाएंगे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। मोहम्मद जाहिद सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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