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एक दिन डर का राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का डरवाद सफ़लतापूर्वक क़ायम हो जाएगा- रवीश कुमार

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की संपत्ति में तीन सौ फ़ीसदी की वृद्धि की ख़बर छपी। ऐसी ख़बरें रूटीन के तौर पर लगभग हर उम्मीदवार की छपती हैं जैसे आपराधिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की ख़बरें छपती हैं। जनता पर इन तीनों बातों का कोई असर नहीं होता है।

कुछ मीडिया ने अमित शाह की ख़बर नहीं छापकर और कुछ ने छापने के बाद ख़बर हटा कर अच्छा किया। डर है तो डर का भी स्वागत किया जाना चाहिए। इससे समर्थकों को भी राहत पहुँचती है वरना प्रेस की आज़ादी और निर्भीकता का लोड उठना पड़ता।

जो लोग चुप हैं उनका भी स्वागत किया जाना चाहिए। बेकार जोखिम उठाने से कोई लाभ नहीं। हम सब इसी तरह से डर का डर दिखाकर डराते रहें तो एक दिन डर का राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का डरवाद सफ़लतापूर्वक क़ायम हो जाएगा।

मुझे आपत्ति सिर्फ एक बात से है। कहीं इस ख़बर पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता का इस्तमाल तो नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो चिंता की बात नहीं वरना बिहार में फिर शपथ ग्रहण समारोह होने लग जाएगा।

मुझे लगता है कि बीजेपी और अमित शाह को बदनाम करने के लिए दो अख़बारों ने इस ख़बर को छापकर हटाया है। कई बार जायज़ कारणों से भी संपत्ति बढ़ती है। इसका जवाब यही है कि ये ख़बर बीजेपी के नेता ख़ुद ट्वीट कर दें। अपनी वेबसाइट पर लगा दें। ट्रेंड करा दें।

मेरा भरोसा करें, संपत्ति में तीन सौ से लेकर हज़ार फीसदी वृद्धि की ख़बरों से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है। रूटीन की ख़बर है ये। करोड़पतियों के पास अपनी कार नहीं होती और वे पर्यावरण की रक्षा के लिए महँगी कार से ही चलते नज़र आते हैं, साइकिल से नहीं।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह आर्टिकल उनकी फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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