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रोहित वेमुला और परमात्मा यादव की संस्थानिक हत्या का फर्क

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर पूरा देश व्यथित हो आंदोलित हो उठा।
रोहित ने संघी और जातिवादी प्रशासन के उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर लिया।
पूरे देश मे रैलियां, गोष्ठियां, कैंडल मार्च, सेमिनार होने लगे।
मनुवाद की कोख से जन्मी संस्थाए रोहित की मौत के बाद पैदा हो रहे जन उफान के बाद बैकफुट पर हो गयी थी लेकिन परमात्मा यादव की मौत के बाद सब कुछ सामान्य है, आखिर क्यों?
परमात्मा यादव एक होनहार आईआईटी रिसर्च स्कॉलर थे। बीएचयू में एमटेक कर जेआरएफ क्लियर कर पीएचडी कम्प्लीट कर चुके परमात्मा यादव ने आत्महत्या कर लिया.
क्योकि उनके साथ लगातार जातीय भेदभाव जारी था। पीएचडी कम्प्लीट होने के बावजूद प्रोफेसर ने आखिर क्यों मार्कशीट व अन्य डॉक्युमेंट्स अपने पास रखा?
परमात्मा यादव की मौत के बाद पुलिस द्वारा उनकी बॉडी का पोस्टमार्टम न कराया जाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह व मनुवादी शक्तियों से उसके मेलजोल और साजिश में शामिल होने की तरफ इंगित करता है।
होनहार रिसर्च स्कॉलर परमात्मा यादव की मौत देश की उच्च शिक्षा में ब्राह्मणवादी क्रूरता का एक जीता-जागता उदाहरण है।
देश कितने भयानक असहिष्णुता के दौर से गुजर रहा हूं कि कही धर्म के नाम तो कहीं जाति के नाम पर लोग मारे जा रहे हैं या मर रहे हैं।
देश मे कितनी वीभत्स स्थिति है कि पीड़ित के बिरुद्ध ही मुकदमे लिखे जा रहे हैं।
पुणे में जातीय छुआछूत की भेंट चढ़ी विधवा महिला निर्मला यादव पर ही मुकदमा दर्ज हो जाता है।
एक मुख्यमंत्री, दूसरे मुख्यमंत्री के घर खाली करने पर मुख्यमंत्री का सरकारी आवास गोमूत्र/गंगाजल से धुलवाता है।
संस्थानिक हत्या की भेंट चढ़े परमात्मा यादव का पोस्टमार्टम नही कराया जाता है।
बड़ी भयानक स्थिति में देश खड़ा है।
एक अहम सवाल इन बातों के बावजूद यह भी है कि रोहित वेमुला की मौत पर देश का दलित समाज आंदोलित हो जाता है पर परमात्मा यादव की मौत के बाद पिछड़ा कुम्भकर्णी निद्रा में लीन है।
आखिर ऐसे समाज का भला कैसे होगा जो झूठे दम्भ में जीता हो और चोट खाने पर आह भी न भरता हो?

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(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका यादव शक्ति के प्रधान संपादक हैं।)


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