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एसपी और बीएसपी को चुनावी राज्यों में महत्त्व नहीं दे रही कांग्रेस, यह रणनीति का एक हिस्सा

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मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस-बीएसपी और कांग्रेस एसपी के अलग होने से भले ही पार्टी को झटका लगा होगा पर कांग्रेस इसमें भी एक रणनीति देख रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार दो मुख्य प्लान पर काम रहे है। कांग्रेस की रणनीति है की एकजुट होकर बीजेपी के दुर्गो को घेरना और क्षेत्रीय दलों को कम स्पेस देना। कांग्रेस कांग्रेस ने अपनी ओर  से एमपी में बीएसपी को अधिकतम 10 सीटे और समाजवादी पार्टी को 3 सीटे देने का फैसला लिया था।

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चुनावी राज्यों में कांग्रेस की रणनीति तैयार करने में जुटे है नेताओ का कहना है की यदि एसपी और बीएसपी अपने आधार वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जगह देने में कोताही बरतते है तो फिर उन्हें भी उसकी मजबूती वाले इलाको में उदारता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस का मानना है कि यदि वह राज्यों में एसपी और बीएसपी को बड़ी हिस्सेदारी देती है तो फिर लोकसभा चुनाव में इनकी मांग और बढ़ जाएगी। यहां तक कि दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खासी कम जगह दे सकती हैं।

कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने में लंबे वक्त के लिए अपना फायदा देख रही है। इन चुनावी राज्यों में कांग्रेस अपनी ताकत को बढ़ाना चाहती है ताकि वह लोकसभा चुनाव से पहले खुद को मजबूती के साथ विपक्ष का नेता साबित कर सके। इसलिए कांग्रेस गठबंधन न करने के इस रिस्क को भी फायदे के तौर पर देख रही है।

कांग्रेस लीडर का कहना है की ‘हम जानते हैं कि बीएसपी, एसपी, तृणमूल और एनसीपी जैसे दल चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कमजोर होकर उभरे ताकि 2019 में वह बढ़त में रहें। लेकिन, हमें अपने हितों की रक्षा करनी होगी।’ कांग्रेस भले ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से सत्ता से बाहर है, लेकिन वह यहां बीजेपी के साथ खुद को ही मुख्य मुकाबले में मानती है। इसके अलावा कांग्रेस राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, गोवा और असम में खुद को बीजेपी के साथ खुद को कड़े  मुकाबले के तौर पर देख रही रही है। उसकी रणनीति यह है कि यहां किसी अन्य तीसरे या चौथे सदस्य को एंट्री क्यों दी जाए।

ओबीसी-एससी-एसटी वोटरों की बड़ी संख्या मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में है। कांग्रेस का मन्ना है यदि इन राज्यों में वह एसपी और बीएसपी को जगह देती है तो उसे भविष्य में अपने जनाधार को खोना पड़ सकता है। यूपी और बिहार में ऐसा होंने के कारण ही, जहां क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के बाद से कांग्रेस वापसी नहीं कर सकी है।


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