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4 शिक्षकों पर दलित शिक्षक से भेदभाव का आरोप, पीड़ित की पीएचडी कैंसल करने में जुटा IIT Kanpur

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Image Credit: Jagran Josh

अध्यापक को भगवान् का दर्जा दिया जाता है परन्तु एक अध्यापक ही दूसरे अध्यापक को घृणा की नजर से देखे तो वह एक शर्म की बात है। अध्यापक का काम दुसरो की गन्दी सोच से पर्दा हटाना है, समाज को बदलना है, ऐसी सोच को फैलाना है जिससे समाज में शांति बनी रहे। परन्तु जब अध्यापक की सोच ही दूसरे अध्यापक के लिए ही गन्दी और भेदभाव वाली हो तो फिर वह अध्यापक अध्यापक नहीं रहता।

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इसी प्रकार की घटना 2018 में सामने आयी थी जिसमे एक अध्यापक ने 4 अध्यापको पर भेदभाव का आरोप लगाया था। घटना कानपुर IIT का था जहाँ एक अध्यापक के साथ भेदभाव किया गया था। आरोप लगाने पर भी उन अध्यापको पर कड़ा एक्शन नहीं लिया गया यहाँ तक की अध्यापक दो गुटों में बंट गए और दलित अध्यापक के खिलाफ हो गए थे। परन्तु अब आरोप लगाने वाले  शिक्षक की पीएचडी रद्द करने की मांग की गयी है। IIT-कानपुर सीनेट ने दलित शिक्षक के पीएचडी शोध प्रबंध को रद्द करने की सिफारिश की है। बता दें कि ये वहीं शिक्षक हैं जिन्होंने प्लेगेरिज्म के आरोपों पर पिछले साल चार साथियो द्वारा उत्पीड़न और भेदभाव की शिकायत की थी। हालांकि संस्थान के अकेडमिक एथिक्स सेल को ऐसा कोई भी कारण नहीं मिला था जिससे थीसस निरस्त हो पाते। 


दरअसल दलित शिक्षक सुब्रह्मण्यम सदरेला के खिलाफ प्लेगेरिज्म के आरोप 15 अक्टूबर, 2018 को कुछ गुमनाम ईमेल के जरिये लगाए गए थे। ये ईमेल कई फैकल्टीज को भेजे गए थे। इस मामले में जांच के दो महीने बाद एक रिटायर्ड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा चार शिक्षकों को IIT-कानपूर के आचरण नियमों का उल्लंघन करने का और साथ ही अत्याचार निवारण अधिनियम की SC / ST रोकथाम का दोषी पाया गया था।


सीनेट की सिफारिश को संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स  के समक्ष जल्द ही रखे जाने की उम्मीद है। बता दें कि सीनेट शैक्षणिक मामलों पर आईआईटी-कानपुर का सर्वोच्च फैसला लेने वाली संस्था है और इसमें सभी फैकल्टी के सदस्य शामिल हैं। इसकी अध्यक्षता संस्थान निदेशक कर रहे हैं। गौरतलब है कि यदि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, तो सदरेला की पीएचडी वापस ले ली जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें IIT-Kanpur में नौकरी गंवानी पड़ सकती है। बता दें कि सदरेला ने हैदराबाद के जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग संस्थान से बीटेक किया और आईआईटी-कानपुर से एमटेक और पीएचडी की है।


1 जनवरी, 2018 को आईआईटी-कानपुर में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग में शामिल होने वाले सदरेला ने 12 जनवरी, 2018 को अपने चार सहयोगियों पर भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।  इसके बाद हुई एक बैठक में 8 मार्च 2018 को अपनी रिपोर्ट में उत्पीड़न के चार दोषियों को पाया था।  बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के कहने पर एक सेवानिवृत्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा बाद की जांच में, 17 अगस्त 2018 को प्रस्तुत रिपोर्ट में आरोपी शिक्षकों को भी दोषी पाया गया। 6 सितंबर को एक  बोर्ड ऑफ गवर्नर्स बैठक में इन निष्कर्षों पर चर्चा की गई।  बोर्ड ने फैसला किया था कि आरोपी शिक्षकों ने आचरण नियमों का उल्लंघन किया है, लेकिन SC / ST अधिनियम का नहीं।वहीं 18 नवंबर 2018 को सदरेला ने शिक्षकों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रोक दिया था।



सदरेला के खिलाफ अनाम शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनकी पीएचडी थीसिस के कुछ हिस्सों – ‘मानवरहित हवाई वाहनों के पैरामीटर आकलन पर हमले के कम और उच्च कोणों पर उड़ान परीक्षण’ अन्य तीन लोगों के काम से प्लेगेराइज्ड था। शिकायत को आईआईटी-कानपुर के निदेशक अभय करंदीकर ने अकादमिक एथिक्स सेल को जांच के लिए भेजा था, जिसमें पाया गया कि शिकायत ‘पहली दृष्टया सही’ थी। हालांकि इसके साथ ही यह सिफारिश की गई थी कि सदरेला अपने शब्दों में प्रश्न में गद्यांश को फिर से लिखें और एक महीने में एक अंदर ही थीसिस प्रस्तुत करें और अपने अपराध के लिए संस्थान के निदेशक को एक माफी पत्र सौंपें।


जब ये सिफारिशें 14 मार्च को सीनेट की बैठक में रखी गईं, तो उसने सदरेला की पीएचडी को निरस्त करने के लिए वोटिंग की गई थी। आईआईटी-कानपुर के एकेडमिक एथिक्स सेल के प्रमुख प्रोफेसर सुमित गांगुली ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की। संस्थान के निदेशक करंदीकर ने पिछले हफ्ते द इंडियन एक्सप्रेस से टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया। उन्होंने रविवार को एक SMS का जवाब देते हुए कहा कि वह विदेश यात्रा कर रहे हैं। वहीं इस पर सदरेला ने बताया- ‘मुझे हाल ही में सीनेट के प्रस्ताव का पता चला। मैंने एथिक्स सेल की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दी है।

जैसा कि सिफारिश की गई है (एथिक्स सेल द्वारा), मैंने अनजाने में हुई गलतियों के लिए खेद जताया है और अपनी थीसिस के परिचयात्मक हिस्से को भी संशोधित किया है और इसे पुनः सबमिट किया है।’ इसके साथ ही सदरेला का कहना है की – ‘अपने इंट्रोडक्शन में मैंने अतीत में किए गए काम के लिए लेखकों को श्रेय दिया है। मेरा शोध 300 पन्नो का है, जिसमें 12-13 पन्ने परिचय के आसपास हैं। किसी ने भी मेरे शोध और मेरे निष्कर्षों पर सवाल नहीं उठाया, जो मूल हैं। मेरी थीसिस को निरस्त करने की सिफारिश केवल मुझे प्रताड़ित करने के लिए एक साजिश है।’


देखा जाए तो यह भेदभाव अध्यापको की तरफ से ही नहीं IIT, अध्यापक और सभी संस्थानों की तरफ से की जा रही है। आरोप लगाने के बाद भी शिक्षक की पीएचडी को वापस लेने कोई मांग की गयी है। अब देखना यह है की IIT के बैठक में क्या फैसला लिया जाता है। एक दलित होने का इस प्रकार से किसी को मुसीबतो का पहाड़ उठाना पड़े इससे अच्छा है की वह इस दुनिया में ही आये। 

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