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NRC में नाम दर्ज करवाने के लिए हिंदुओं ने अपनाया ऐसा रास्ता की सरकार भी चौक गई

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NRC यानी National Register of Citizens को जारी करने में अब महज 5 दिन ही बचे हैं। NRC को लेकर देश में काफी बवाल मचा हुआ है। और हाल ही में सरकार के सामने कुछ ऐसे चौका देने वाली बात आई है जिसे देखकर राज्य की सत्ताधारी बीजेपी भी हैरान है। भारतीय जनता पार्टी इन अटकलों को लेकर बेचैन है NRC कि आखिरी सूची से बहुत सारे हिंदू जो मुख्यत: बंगाली, नेपाली या हिंदीभाषी हैं, वे बाहर हो सकते है । असम में विवादास्पद NRC की डेडलाइन बेहद नजदीक है। न्यूज एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों ने हवाले से रविवार को बताया कि एनआरसी में नाम दर्ज करवाने के लिए मुसलमानों से अधिक हिंदुओं ने फर्जी दस्तावेज जमा कराए हैं। बता दें कि असम के प्रमाणित नागरिकों की पहचान करने वाली NRC की अंतिम सूची 31 अगस्त को प्रकाशित होगी।

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सूत्रों के मुताबिक, ‘‘यह रोचक तथ्य है कि संदिग्ध हिंदू आवेदकों की ओर से बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया। उनकी ओर से जमा 50 फीसदी से अधिक दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया गया। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है क्योंकि आशंकाए यह लगाई जा रही थी की संदिग्ध मुसलमान अप्रवासी ही एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए गलत हथकंडों का इस्तेमाल करेंगे पर सच्चाई एकदम उलट ही निकली । हालांकि, कई संदिग्ध हिंदुओं की पहचान की गई है और अनुमान लगाया जा सकता है कि बड़ी संख्या में ऐसे अप्रवासी असम में मौजूद हैं।’’

हाल में असम की भाजपा सरकार ने दावा किया था कि एनआरसी के ड्राफ्ट से मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं के नाम बाहर किए गए है। बीजेपी नेता अब सार्वजनिक तौर पर खुलकर इसके खिलाफ बोल रहे हैं। वहीं, दक्षिणपंथी संगठन मसलन एबीवीपी और हिंदू जागरण मंच ने हिन्दू समुदाय के लोगो के लिए असम में कई जगह प्रदर्शन भी किया है।

राज्य सरकार ने दावा किया कि आंकड़े जाहिर करते हैं कि भारत-बांग्लादेश सीमा के पास जो जिले पड़ते है वह पर अधिक मुस्लिम अप्रवासी होने की आशंका ज्यादा है पर हुआ इसके विपरीत जहां रही के मूल निवासी बहुल ज़िले है वह से अधिक लोगों के नाम एनआरसी से बाहर किए गए हैं। ऐसे में एनआरसी में खामी बताई जा रही है। वहीं, आरएसएस असम क्षेत्र के वरिष्ठ पदाधिकारी और बौद्धिक प्रचार प्रमुख शंकर दास ने कहा कि एनआरसी में खामियां हैं और इसे चुनौती दी जाएगी।

एनआरसी के अपडेशन की प्रक्रिया में शामिल सूत्रों ने बताया कि निखिल दास का मामला इसका उदाहरण है, जिन्होंने पिता नितई दास, मां बाली दास, भाई निकिंद्र दास और बहन अंकी दास को एनआरसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया, लेकिन दस्तावेजों की जांच के दौरान पता चला कि उसके अलावा परिवार के सभी सदस्य बांग्लादेश के सुमानगंज जिले के कछुआ गांव में रहते हैं। पूछताछ में निखिल ने स्वीकार किया कि अक्टूबर 2011 में अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ था और यह इकलौता मामला नहीं है। रोचक बात है कि निखिल के पास मतदाता पहचान पत्र, भारत का जन्म प्रमाण पत्र और यहां तक कि पैन कार्ड भी था।  अब ऐसे में यह मामला पेचीदा होता जा रहा है की हिन्दीभाषी हिन्दू ही NRC की चपेट में आ रहे है। 


बता दें कि 24 मार्च 1971 से पहले बांग्लादेश से भारत आए अप्रवासी कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा कर सकते हैं। असम में दशकों से बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश से अवैध तरीके से आ रहे हैं। इसलिए 1985 में हुए असम समझौते की एक शर्त अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें बाहर निकालने की है। NRC को जारी करने में अब महज 5 दिन ही बचे हैं। इस बीच, राज्य की सत्ताधारी बीजेपी इन अटकलों को लेकर बेचैन है कि आखिरी सूची से बहुत सारे हिंदू जो मुख्यत: बंगाली, नेपाली या हिंदीभाषी हैं, वे बाहर हो जाएंगे। वहीं, बड़ी तादाद में अवैध प्रवासियों’ को लिस्ट में जगह मिल जाएगी।

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