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राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदे को लेकर पैनल ने मोदी सरकार पर शिक्षा का भगवाकरण करने के लगाए आरोप

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(image credits: Rediff.com)

मौजूदा सरकार पर आरएसएस संस्था के अनुसार अक्सर देश में शिक्षा निति को प्रभावित करने के आरोप लगते रहते है। देश की जनता भी सरकार पर शिक्षा प्रणाली में अपनी सोच के हिसाब से बदलाव करने के लिए उनके खिलाफ सवाल उठाती रहती है। आहिस्ता आहिस्ता बीजेपी सरकार शिक्षा समेत देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को लेकर छोटे छोटे निर्णय लेकर उनपर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती है।

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सरकार के इस प्रकार के रवैये से सवाल उठने लगे है। ऑल इंडिया सेव एजुकेशन समिति (एआईएसईसी) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदा 2019 को ‘हिंदुत्व पैकेजिंग’ और ‘वैश्विक पूंजीकरण’ बताया है। समिति की तरफ से यह बयान गुजरात विद्यापीठ में रविवार को आयोजित एक सेमिनार में दिया गया। समिति ने इस शिक्षा मसौदे को पेश करने में सरकार की जल्दबाजी के बारे में भी बताया।

समिति ने बताया कि यह बहुत ही दुखद है कि 450 पन्नों से अधिक के इस दस्तावेज पर सुझाव के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सिर्फ कुछ ही सप्ताह दिए। एआईएसईसी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश एन शाह ने कहा, ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा में दो बिंदुओं पर ही ध्यान दिया गया है।

इस शिक्षा मसौदे में पहला पैकेज हिंदुत्व का है और दूसरा है वैश्विकरण का ट्रेंड। बाजार की ताकतों के आधार पर शिक्षा की योजना और संकीर्ण राष्ट्रवादी ताकतों को चुनौती दिए जाने की जरूरत है। हम इस तरह के सेमिनार से इसे चुनौती देना जारी रखेंगे। गृह मंत्रालय मंत्री अमित शाह ने कहा तीन भाषा की नीति जो देश में हिंदी को थोपने की तरफ बढ़ती है, पर मसौदा समिति देश के शिक्षकों, शिक्षाविदों, छात्रों, स्कॉलर और उनके संगठनों के बड़े वर्ग राय शामिल करने में असफल रही।

कमाल की बात है की इस सेमिनार में शिक्षा के अधिकार के तहत 10वी तक किसी भी बच्चों को फेल नहीं करने की नो-डिटेंशन पॉलिसी का समर्थन किया गया। जो की उचित नहीं लगता है। इस कार्यक्रम में 14 राज्यों के करीब 250 लोगों ने हिस्सा लिया। एआईएसईसी के महासचिव अनीस कुमार रे ने कहा, ‘प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट मंत्री इस समय शिखर पर हैं।


उन्होंने बताया की, कैबिनेट ने राष्ट्रीय शिक्षा आयोग या नेशनल कमीशन ऑन एजुकेशन का प्रस्ताव किया था। यह आयोग देश के समूची शिक्षा प्राइमरी से लेकर यूनिवर्सिटी लेवल तक को नियंत्रित करेगा। यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है।’ इतना ही नहीं अनीस कुमार ने भारतीयता और भारतीय परंपरा के नाम पर सरकार पर शिक्षा का भगवाकरण करने के आरोप लगाए।

इस शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम और कोर्सेस में अवैज्ञानिक और इतिहास को छोड़कर अन्य विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। सेमिनार के दौरान स्कूलों में सेमेस्टर सिस्टम, चार साल का ऑनर्स और बैचलर ऑफ एजुकेशन और 15 साल का सेकेंडरी कोर्स, दूरस्थ और ऑनलाइन एजूकेशन के साथ ही शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता को नकारे जाने का मुद्दा भी उठाया गया।

शिक्षा को लेकर मौजूदा सरकार को एक एक कदम उठाने से पहले बहुत सोच समझकर उठाना चाहिए। देखा जाये तो मोदी सरकार शिक्षा में बड़े स्तर का बदलाव करके कुछ ऐसा सोच रही है। जिससे आनेवाले समय में विद्यार्थियों और देश में एक खास प्रकार की सोच को बढ़ावा दिया जा सकेगा। वह कौन से सोच होगी वह तो मौजूदा सरकार को छोड़कर शायद ही कोई बता सके।

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