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UAPA(गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून) में संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

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(image credits: dna india)

हाल ही में केंद्र सरकार ने UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून) में बदलाव किये। जो की काफी विवादास्पद भी रहा। वही इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाये भी दाखिल की गई। इसमें मांग की गई है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के खिलाफ है। इन याचिकाओं पर गौर करते हुए कोर्ट ने इस कानून में संशोधन का परीक्षण करने का निर्णय लिया है।

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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने सजल अवस्थी और गैर सरकारी संगठन ‘असोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए। साथ ही कोर्ट ने संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से शुक्रवार को जवाब मांगा।

बता दें कि संसद से पास किए गए कानून के अनुसार केन्द्र सरकार किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी की श्रेणी में डाली सकती है। फिर वह चाहे किसी समूह के साथ जुड़ा हो या नहीं। राजधानी दिल्ली के रहने वाले याचिकाकर्ता अजय अवस्थी ने यचिका दाखिल करते हुए कहा है कि, यह UAPA 2019 संविधान में दिए गये मूलभूत अधिकारों के खिलाफ है।

याचिकाओं में अवैध गतिविधियां (रोकथाम) कानून में किये गये संशोधनों को कई आधार पर चुनौती दी गई है। याचिकाओं में कहा गया है कि ये संशोधन नागरिकों के मौलिक आधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

बता दे की UAPA को वर्ष 1967 में ‘भारत की अखंडता तथा संप्रभुता की रक्षा’ के उद्देश्य से पेश किया गया था। और इसके तहत किसी शख्स पर ‘आतंकवादी अथवा गैरकानूनी गतिविधियों’ में लिप्तता का संदेह होने पर किसी वारंट के बिना भी तलाशी या गिरफ्तारी की जा सकती है। इसके आधार पर छापों के दौरान अधिकारी किसी भी सामग्री को ज़ब्त कर सकते हैं। आरोपी को ज़मानत की अर्ज़ी देने का अधिकार नहीं होता, और पुलिस को चार्जशीट दायर करने के लिए 90 के स्थान पर 180 दिन का समय दिया जाता है।


आपको बता दे की इसी साल जून माह में पांच अन्य कार्यकर्ताओं को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। UAPA कानून में विवादसपद भाग यह है की, जिस भी संगठन को सरकार’गैरकानूनी संगठन, आतंकवादी गुट या आतंकवादी संगठन’ मानती है, उसके परिवार के सदस्यों को भी गिरफ्तार किया जा सकता है।

देखा जाए तो केंद्र सरकार द्वारा इस तरह के कानून में अपने हिसाब से संसोधन कर देना बिलकुल भी उचित नहीं है। अब देखना यह होगा की आखिर में सुप्रीम कोर्ट UAPA कानून में किये गए बदलाओं को लेकर क्या निर्णय लेता है।

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