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दलितों के प्रति सहारनपुर जैसी हिंसा को कैसे समझें?

सहारनपुर के शबीरपुर गांव में हुई जातीय हिंसा में एक व्यक्ति की हत्या और 60 से ज्यादा दलित घरों को जला दिया गया था जिसके बाद से जिले के ठाकुर वर्चस्व वाले गांवों में रहने वाले अधिकांश दलित आगे हिंसा होने से डर रहे हैं। उनमें भय का माहौल है। इस मामले के दूसरे पहलुओं को समझाते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रतन लाल ने लिखा है….

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दलितों के प्रति सहारनपुर जैसी हिंसा को कैसे समझें?
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, “यदि किसी अस्पृश्य को क्षति पहुंचाई जाए तो उसका प्रतिशोध लेने वाला है ही नहीं. अतः अस्पृश्यों के प्रति हिन्दू कोई भी अन्याय कर सकते हैं और दंड से बच निकलते हैं. इसका कारण है …अस्पृश्य असंगठित हैं. वे जात-पांत के बंधन से जकडे हुए हैं. सवर्ण हिन्दू की भांति वे भी जात-पांत में विश्वास रखते हैं….उसकी वजह से संयुक्त कार्यवाई असंभव हो गई है (देंखे, पेज- 174-75, खंड 10).
क्यों नहीं मिलता दलितों को न्याय-
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, “…अधिकारी अस्पृश्य-विरोधी और हिन्दू समर्थक होता है. जब भी उसे अपने अधिकार या विवेक का प्रयोग करना होता है, तो वह उसका प्रयोग पूर्वाग्रह से अस्पृश्य के विरुद्ध करता है. पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष्ट होते हैं. यदि केवल भ्रष्ट हो तो स्थिति संभवतः उतनी ख़राब न हो, क्योंकि भ्रष्ट अधिकारीयों को तो कोई भी पक्ष खरीद सकता है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी तथा मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते हैं. हिन्दुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती. एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो हर हिन्दू में जन्मजात होती है” (खंड 10, पेज-179).

 

(लेखक डीयू में प्रोफेसर हैं।)


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