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विमर्श

मसला नुमाइंदगी व समतामूलक समाज का

न मार्क्स फेल हुए हैं, न मार्क्सवाद। मार्क्सवादी​ अपने समाज के ताने-बाने को समसामयिक परिप्रेक्ष्य में नहीं समझने की ऐतिहासिक जिद के चलते अपनी विफलता का ठीकरा मार्क्स पर फोड़कर उनके साथ ज़्यादती ही करेंगे। किसी विचारधारा को संपूर्णता में नहीं समझने की क़सम खाने पर बहुतेरे प्रयोग टिकते नहीं। जड़ता व ठहराव तोड़ने के लिए कुछ क्षेपक जोड़ना पड़े तो संपूर्ण समृद्धि के लिए बुरा नहीं है। आज महान दार्शनिक मार्क्स का 200वां जन्मदिन है।
बकौल प्रो. तुलसीराम, “भारतीय समाज के बारे में मार्क्स, एंगेल्स ने 1853 तथा 1858 के बीच कई लेख लिखे। मूलतः जाति से संबंधित कार्ल मार्क्स के विचार अधूरे रह गए, अन्यथा हमारे लिए वे युगांतरकारी सिद्ध हुए होते। मार्क्स बुद्ध को नहीं जानते थे। यदि ऐसा होता, तो वे जाति व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ लिख जाते। फिर भी उन्होंने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत सीख ली जा सकती थी। मार्क्स भारत के विकास में जाति व्यवस्था को सबसे बड़ी बाधा मानते थे। उन्होंने भारत में धर्मांधता और मिथकों की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया है। मार्क्स ने जगन्नाथ यात्रा के दौरान रथ के पहिए के नीचे कूदकर आत्महत्या करने वालों का भी जिक्र किया है। इन आत्महत्याकर्ताओं का विश्वास था कि ऐसा करने से वे सीधे स्वर्ग चले जाएंगे। मार्क्स ने जगन्नाथ मंदिर से संबद्ध वेश्यावृत्ति का भी जिक्र किया है।
इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह लिखी है कि भारत को भारतीय लोगों ने जीत कर अंग्रेजों को सौंप दिया। मार्क्स ने प्रमुखता से उल्लेख किया है कि सिंधिया राजघराना अंग्रेजों को समर्थन दे रहा था। सन् 1857 के बंगाल रेजिमेंटों की भारतीय इतिहासकारों द्वारा बड़ी तारीफ की जाती है, क्योंकि मंगल पांडे उसी के सिपाही थे, जिन्होंने हथियारों में गोचर्म के इस्तेमाल के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। कार्ल मार्क्स उस रेजिमेंट के बारे में लिखते हैं कि बंगाल आर्मी के कुल 80 हज़ार सैनिक थे, जिनमें 28 हज़ार राजपूत, 23 हज़ार ब्राह्मण तथा 13 हज़ार मुसलमान थे। निम्न जातियों से सिर्फ़ 5 हज़ार लोग थे। अपने गहन अध्ययन के बावजूद पार्टी में मैं मूर्ख बना रहा। ऊपर से जातिवादी होने वाले आरोप से मैं छिन्न-भिन्न होने लगा था। उस समय मेरी समझ में आने लगा था कि वर्ग संघर्ष के माध्यम से भारत में समाजवादी व्यवस्था लागू होना असंभव-सा है।”
कुछ लोग अपने ज़ेहन में अपनी जाति भी लिए चलते हैं। अपने-अपने इलाक़े व प्रांतों से सूबे व देश की राजधानी पहुँचते हैं, तो जातीय समूह भी बनाते-तलाशते हैं व उस गोलबंदी का हिस्सा बनकर ख़ुद को कतिपय दुश्वारियों से महफ़ूज़ महसूस करते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे गुटों की पहचान बड़ी आसानी से की जा सकती है, जो अपनी जातीय अस्मिता की बैसाखी के सहारे संघर्ष की दुश्वार राहें हमवार करने की जुगत में लगे रहते हैं। वामपंथ से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं, मगर ख़ुद को कॉमरेड कहलाना पसंद करते हैं।  बिहार-यूपी में साम्यवाद को कोसने वाले व जेएनयू आकर वामपंथ को रूमानी नज़रों से देखने वाले ऐसे छद्म वामपंथियों ने ही वामपंथ की दुर्गति की है, उसका मज़ाक उड़ाया है। मार्क्स (अंक / ग्रेड ) के लिए मार्क्सिस्ट होने वाले व काम के लिए रेड (लाल) होने वाले कुछ कामरेड पहले विचारधारा की स्पष्ट रेखाएँ तो खींच लें। “कमरे के अंदर जातिवाद और कमरे के बाहर साम्यवाद” की चिरकुट नीति ने ही  इस देश में साम्यवाद का बेड़ा गर्क़ किया है। चार सवर्ण ‘महज संयोगवश’ एक साथ नज़र आ जायें, तो वामपंथ की उखड़ती-टूटती सांसें दुरूस्त होने लगती हैं, प्रगतिशीलता अपनी पराकाष्ठा पर होती है, सामाजिक परिवर्तन की चिंता अपने चरम पर होती है, जनांदोलन अपने निहितार्थ को छूने लगता है, पर कहीं पाँच शोषित-वंचित-दलित-उत्पीड़ित-लांछित-लुंठित बैठते-टहलते-हसते-बतियाते-गपियाते दिख जायें, तो वामपंथ रसातल में जाने लगता है, कम्युनिज़्म की कमर ही टूटने लगती है, साम्यवाद का मेरुदंड लड़भड़ाने लगता है, ज़हनियत की पसमांदगी अपने निहायत निकृष्टतम रूप में उभरकर सामने आने लगती है, सामाजिक न्याय मज़ाक बन कर रह जाता है। यह हिपोक्रसी की इंतिहा है।
जिसने पूस की रात कभी देखी ही नहीं, जी ही नहीं, वो हलकू का दर्द भला क्या जाने ! मगर, बेवजह ब्राह्मण को गाली देने, राजपूत पर तंज़ कसने, कायस्थ को बेईमान व चालाक करार देने और भूमिहारों को शातिर का प्रमाण-पत्र बाँटने से भी यदि समरस, सौहार्दपूर्ण व समतामूलक समाज की स्थापना होनी होती, तो कब की हो चुकी होती।
वैसे ही, दलितों के उभार के प्रति एक तरह की हेय दृष्टि, आदिवासियों के उन्नयन के प्रति उपेक्षा-भाव व पिछड़ों की उन्नति-तरक्की को संदेहास्पद ढंग से देखते हुए खारिज़ करने की मनोवृत्ति से यदि आप चाहते हैं कि राष्ट्रधर्म का निर्वाह हो जायेगा, आरक्षण की ज़रूरत समाप्त हो जायेगी, तो आप लिख लीजिए कि इस मानसिकता के साथ इस देश से आप  क़यामत तक आरक्षण ख़त्म नहीं कर पायेंगे। आरक्षण, आरक्षण की आवश्यकता समाप्त करने के लिए लागू हुआ था, पर यदि आप हर बात के सामान्यीकरण की अपनी आदतों में तब्दीली नहीं लाते हैं, तो ये अनंतकाल तक रहेगा।
कुछ मित्र कहते हैं,”मेरिट शुड नोट बी इगनॉड”।  किस योग्यता की बात आप करते हैं ? प्रतिभा की इतनी ही क़द्र थी, तो अंग्रेजों को क्यों भगाया ?  वो हमसे कहीं ज़्यादा प्रतिभावान थे और शायद ईमानदारी में भी कई स्तर पर आपसे आगे। जब अंग्रेज यहाँ थे, हमारी बौद्धिक हैसियत व औकात एक सब- इंस्पेक्टर तक बनने की नहीं थी, एकाध सत्येन्द्रनाथ टैगोर व सुभाषचंद्र बोस जैसे आइसीएस के उदाहरण को छोड़ दें तो। मसला क़ाबिलियत का नहीं है, मसला नुमाइंदगी का है। ये वो लोग हैं, हज़ारों सालों से जिनके पेट पर ही नहीं, दिमाग़ पर भी लात मारी गयी है। समाज व मुल्क़ की मुख्यधारा से इन्हें जोड़ने  हेतु विशेष अवसर प्रदान किया ही जाना चाहिए।

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हमारी संवैधानिक प्रतिबद्धता है कि समान के साथ समान व्यवहार होगा। कभी-कभी बराबरी ग़ैर-बराबरी को जन्म देती है। समान व असमान के बीच समान स्पर्धा नहीं हो सकती। राष्ट्रपति भवन में काबुल से लाये गये घोड़े, जिन्हें काजू-बादाम-पिस्ता खिलाया जाता हो, और बिहार के फरकिया के घोड़े, जिन्हें दो जून की घास तक नसीब न हो; को एक ही रेस में दौड़ाकर उनका समुचित, सम्यक् व न्यायपरक मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है ? यहीं समग्रता में आरक्षण की वाजिब बहस की ज़रूरत महसूस होती है व सदियों से सताये गये लोगों को इसकी तलब लगती है। अब, ये कहना कि ज्ञान पर शत प्रतिशत आरक्षण हमें तो नहीं है, हमारे पुरखों ने किनके साथ क्या अन्याय किया, नहीं किया, उनसे हमारी क्या वाबस्तगी? प्रथमद्रष्टया तो ये तर्क थोड़ी देर के लिए ठहर सकता है, पर जब बारीकी से आप विश्लेषण करें, तो पायेंगे कि कहीं-न-कहीं ये इतिहास को नकारने का सिण्ड्रोम (डिनायल ऑव हिस्ट्री) है।
तुलसीराम जी लिखते हैं, “मार्क्स ने कहा था कि ब्रिटिश शासकों का भारत में दोहरा मिशन था। एक तो यहां के एशियाटिक समाज को ध्वस्त करना तथा दूसरा एशिया में यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था लागू करना। मार्क्स के इस कथन से ही जाहिर होता है कि एशियाई समाज यूरोपीय समाज से बिल्कुल भिन्न था, इसलिए वर्ग संघर्ष का फार्मुला बहुत हद तक यहां फिट नहीं बैठता है। भारत के मजदूरों का एक हिस्सा हिंदुत्ववादी ताक़तों के साथ है। बाक़ी सैकड़ों युनियनों में बंटा हुआ है। यहां हर पार्टी की अपनी मजदूर यूनियनें हैं। फिर क्रांति का आधार कहां से आएगा?”
जब आप ये कहते हैं कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में आदिवासी को आमंत्रित कर उन्हें बस जलपान कराना चाहिए व उत्तीर्ण घोषित कर देना चाहिए, दलित को बस परीक्षा में बैठने मात्र से पास कर देना चाहिए, पिछड़ों के लिए दस में तीन प्रश्न के ही उत्तर देने अनिवार्य होने चाहिए व सामान्य वर्ग के लिए सभी दस प्रश्न अनिवार्य होने चाहिए; तो आप एक तरह से उन वर्गों को गाहे-बगाहे उकसा ही रहे होते हैं, वैमनस्य का विषवपन ही कर रहे होते हैं। आरक्षण तो बस संस्थान में प्रवेशमात्र के लिए है, आगे अपनी योग्यता, श्रम, जुनून व अध्यवसाय से ही उपाधि व ख्याति मिलती है।
इन अनोखे-अलबेले प्राणियों की रचनाधर्मिता यहीं नही विराम लेती, बल्कि हिलोरें मारते हुए आइसीसी को भी अयाचित परामर्श देती है कि ओबीसी खिलाड़ी द्वारा यदि चौका लगाया जाय, तो उसे छक्का माना जाना चाहिए, दलित खिलाड़ी द्वारा नोबॉल फेंके जाने पर भी कोई अतिरिक्त रन विपक्षी टीम को नहीं मिलना चाहिए, आदिवासियों को दो बार आउट होने पर ही आउट करार दिया जाना चाहिए, वगैरह-वगैरह।  हमारे सामान्य वर्ग के कुछ साथियों की ये असामान्य कल्पनाशक्ति व अद्भुत सृजनशीलता, मुझे नहीं पता कि उन्हें कहाँ ले जायेगी। पर, उनके ये  छिछले व उथले मज़ाक सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी असीमित कुंठा के द्योतक हैं। दो बार एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाली संतोष यादव, विनोद काम्बली, सुशील कुमार, कुलदीप यादव, दिलीप टिर्की, जयंत यादव, पिछले विश्व कप क्रिकेट में शानदार गेंदबाजी करने वाले उमेश यादव समेत न जाने कितने पिछड़े, दलित, आदिवासी खिलाड़ियों ने ऐसे कुतर्कों को अपने प्रदर्शन से धराशायी कर दिया। अव्वल तो ये कि इन खिलाड़ियों को टीम की जीत से मतलब रहता है, कभी इन अनावश्यक सवालों में उलझते भी नहीं।
प्रो. तुलसीराम अपनी आत्मकथा मणिकर्णिका में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “धीरे-धीरे क्लास (वर्ग) तथा कास्ट (जाति) की अवधारणा समस्याजनक होकर मेरे सामने आने लगी। व्यावहारिक रूप में मुझे यह अनुभव होने लगा कि मार्क्स जिस मजदूर वर्ग की बात करते थे, उसका अधिसंख्य हिस्सा भारत में सामाजिक भेदभाव का शिकार दलित समाज से आता था। शायद कम्युनिस्ट पार्टी का ध्यान इस प्रश्न पर नहीं जाता था। मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के लगभग 90 साल पूरे होने जा रहे हैं, किंतु कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी भी कोई राष्ट्रीय स्तर पर जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलन नहीं चलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि समय बीतने के साथ ही दलितों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी का आधार लगभग समाप्त हो गया। इन तमाम नकारात्मक परिस्थितियों का प्रभाव यह पड़ा कि दलित भी सवर्णों की तरह जातिवादी राजनीति में व्यस्त हो गए। परिणामस्वरूप जातिवाद जितना शक्तिशाली इस समय है, उतना वह पहले नहीं था। कम्युनिस्ट पार्टी का यह तर्क आज भी आश्वस्त नहीं कर पाता है कि समाजवादी व्यवस्था लागू होने के बाद सारे वर्ग जाति के भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। कल्पना के तौर पर यह बात अच्छी लगती है। यह कल्पना मुझे किसी उपन्यास की परिकल्पना-सी लगती है।”
तुलसीराम जी की उपर्युक्त बातों पर खुले मन से विचार किया जाना चाहिए। भारतीय समाज द्वारा यह मार्क्स के प्रति सच्ची भावांजलि होगी।
जहाँ कुछ साथी मुझसे निरर्थक ही मेरी जाति जानने में दिलचस्पी रखते हैं, वहीं मेरे ज़िले के ही एक दोस्त ने पिछले दिनों कहा कि एक महासभा का गठन हुआ है और हम चाहते हैं कि आप उसमें अपने स्तर से योगदान दें। मैंने कहा कि आपको कैसे पता कि जिस जातीय महासभा में आप मुझे रखना चाहते हैं, मैं उससे संबद्ध हूँ ?  माफ कीजिएगा, मैं ऐसी किसी भी महासभा का पक्षधर नहीं हूँ। हाँ, जब कहीं उपेक्षितों, वंचितों, शोषितों, पीड़ितों के साथ गैरबराबरी व किसी तरह के भेदभाव की बात होगी; चाहे वो किसी जाति, धर्म का क्यों न हो, मैं अपने विवेक व सामर्थ्य से उनके साथ खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि इस देश के आधुनिक इतिहास में आज़ादी से भी हसीन, ख़ूबसूरत व अहम कोई घटना दर्ज़ हुई है, तो वो है संविधान का निर्माण व उसका अंगीकृत व प्रतिष्ठित होना। दुनिया के सबसे बड़े, कमोबेश क़ामयाब व चिरटिकाऊ लोकतंत्र के उस पवित्र संविधान की परिधि को सिकोड़ने के बजाय सुलझी व परिष्कृत सोच के साथ हम अंदर से उसे कितना फैलाव देते हैं व निहितार्थ को स्पर्श करने में कामयाब होते हैं; इसी में उसके चिरायुत्व का राज़ है।

 

(लेखक जेएनयू में शोधार्थी हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

 

संपादन- भवेंद्र प्रकाश


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