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4 साल पहले: जब एक चिट्ठी पीएमओ पहुंचकर लीक हुई थी…

साल 2003 की बात है। तब हम स्टूडेंट थे और इंजीनियर सत्येंद्र दुबे नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया में प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी सड़क योजना स्वर्णिम चतुर्भज सड़क योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को नजदीक से देखा। उन्होंने तब प्रधानमंत्री अटलबिहारी वापजेयी को एक सीलबंद चिट्ठी लिखी जिसमें योजना में व्याप्त करप्शन का पूरा कच्चा चिट्ठा था।

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ताकतवर भ्रष्ट अफसरों, इंजीनियरों ठेकेदारों के नाम थे। दुबे ने लिखा था कि करप्ट पावरफुल लोगों के उस नेक्सेस से वे अपने दम पर नहीं निपट सकते। इसलिए वे पीएम को खत लिख रहे हैं। उनने पीएम से ताकीद भी की थी कि उनका नाम लीक ना हो, वरना वो पूरा नेक्सस उनकी जान का दुश्मन हो जाएगा।
खैर उस खत के बाद भ्रष्ट लोगों पर तो कार्रवाई नहीं हुई। उन दलालों, पावर ब्रोकरों के कार्टेल का तो बाल भी बांका नहीं हुआ लेकिन सत्येंद्र दुबे का नाम पीएम या पीएमओ पता नहीं कहां से लीक हो/कर दिया गया। उसके कुछ ही दिन बाद सत्येंद्र दुबे की हत्या हो गई।

कहानी सत्येंद्र दुबे के ईमानदारी के इस हश्र के साथ खत्म नहीं होती है। इस घटना के करीब सात साल बाद सत्येंद्र दुबे के कथित हत्यारों को सजा भी हुई। उस सजा की एक और खास बात थी। सजा पाने वाला तो कहता ही रहा वो इस मामले में निर्दोष है, दुबे के परिवार वाले भी बोलते रहे।

असल में दुबे की हत्या को राहजनी का केस बताकर कुछ छोटे-मोटे उचक्कों को स्केप गोट बनाकर असली अपराधियों को बचा लिया गया। 2003 की उस घटना के के 14 साल बाद पीएमओ को एक और चिट्ठी जाती है। सुप्रीम कोर्ट में भ्रष्टाचार को लेके।

 


पीएमओ इस बार चिट्ठी भेजने वाले कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश कर्णन का नाम नहीं लीक करते, उस चिट्ठी को उसी सप्रीम कोर्ट में भेज देते हैं जिसे चिट्ठी में जजों की नियुक्ति, प्रमोशन के करप्शन की गंगोत्री बताया गया। इस बार दुबे की तरह कर्णन की हत्या नहीं होती, बल्कि उसे पागल करार देके सात जजों की बेंच द्वारा सर्वसम्मति से छह महीने का जेल दे दिया जाता है।
(लेखक फ्रीलांस पत्रकार और फिल्म राइटर हैं। ये उनके निजी विचार हैं, यह आर्टिकल उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)


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