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वित्तमंत्री जी! कीमत किसे चुकानी पड़ेगी और विकास किसका होगा?

कल वित्त मंत्री ने कहा कि अगर देश के लोग विकास चाहते हैं तो कीमत तो चुकानी पड़ेगी। सभी बात है। देश के लिए और बड़े उद्देश्यों के लिए त्याग की बात तो गाँधी भी करते थे।

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एक बात वित्त-मंत्री ने नहीं बताई वह यह कि कीमत किसे चुकानी पड़ेगी और विकास किसका होगा।

आखिर कौन सा चमत्कार हो रहा है कि आम गरीब और मध्यवर्गीय गृहस्थ – किसान, विद्यार्थी और छोटे व्यापारी तो लगातार कीमत ही कीमत चुका रहे हैं और उधर पतंजलि वाले बालकृष्ण, अम्बानी और डी-मार्ट वाले दमानी का अप्रत्याशित विकास होता जा रहा है।

पतंजलि वाले बालकृष्ण की सम्पत्ति में इस बीच 173% की बढ़ोतरी हुई है।

डी मार्ट वाले दमानी की सम्पत्ति में 320% की बढ़ोतरी हुई है।


और अम्बानी की सम्पत्ति में 58% वृध्दि हुई है। आज अम्बानी की संपत्ति आज की तारीख में यमन के सकल घरेलू उत्पाद से 50% अधिक है।
गरीबों से अगर आपका राब्ता नहीं है तो मुहल्ले के दो-तीन छोटे दुकानदारों से ही बात कर आइए कि उनकी आमदनी में इस बीच कितनी वृध्दि हुई है। पूछिएगा कि वे सिर्फ विकास की कीमत ही चूका रहे हैं या उनका विकास भी हो रहा है। अगर आप आम वेतनभोगी हैं तो यह सवाल दिल पर हाथ रखकर खुद से भी पूछ सकते हैं।

आज बी.बी सी ने ज्यां द्रेझ की नई किताब- Sense and Solidarity: Jholawala Economics for Everyone समीक्षा छापी है। ज्याँ द्रेझ कहते हैं आज इस बात की जरूरत सबसे ज्यादा है कि झोलाछाप कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों की बात गौर से सूनी जाए। अबतक टीवी स्टूडियो में बैठकर उनका उपहास ही किया गया है। स्वपन दासगुप्ता जैसे लोगों ने तो राजनीति और बौध्दिक दायरों में अपनी जगह ही झोला छाप लोगों का उपहास उड़ाते हुए बनाई है।

आज गाँधी जयन्ती के दिन थोड़ा समय निकालकर ज्यां द्रेझ की किताब की समीक्षा पढ़ें।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस में अध्ययनरत हैं।))

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