fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
विमर्श

सामंती त्यौहार है रक्षा-बंधन, पितृसत्ता की जड़ों को देता है मजबूती

कितना सड़ा गला समाज है हमारा। दूसरों की नजरों के सामने हम कितने साफ कितने शरीफ बनते हैं, लेकिन हमारे दिलों में, हमारे घरों में कितनी गन्दगी भरी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमारा समाज घोर पितृसत्तात्मक, पुरुष प्रधान और महिला विरोधी है, इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन 68 बलात्कार भारत मे होते हैं। गाँव हो या शहर, भीड़ हो या सुनसान इलाके, दिन हो या रात महिलाएं अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती हैं। यहां तक कि हमारे अपने घरों में भी बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं।

Advertisement

एक सर्वे के अनुसार अधिकांश लगभग 98 फीसदी यौन शोषण की घटनाएं रिश्तेदारों, जानकारों या पड़ोसियों द्वारा अंजाम दी जाती हैं जिन पर लड़कियां सबसे ज्यादा भरोसा करती हैं। पिछले दिनों हरियाणा में डॉक्टरों द्वारा एक नाबालिग लड़की को गर्भपात की इजाजत नहीं मिली जिसके मामा द्वारा लगातार उसका बलात्कार किये जाने की वजह से गर्भ ठहर गया था। चलती सड़क पर हजारों निगाहें उनके अंगों का एक्स रे कर रही होती हैं। महाभारत में नीति और धर्म के रक्षकों- ज्ञाताओं की भारी उपस्थिति में भी भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण अंजाम दिया गया।

इस शुक्रवार को ही भारत के पॉश शहर चंडीगढ़ में एक आईएएस की बेटी के अपहरण की कोशिश की गई और अगर सत्ता में बैठी राष्ट्रवादी पार्टी के रसूखदार लोगों के ये लाडले अपने मकसद में कामयाब हो जाते तो उस लड़की के शब्दों में उसकी लाश बलात्कार के बाद किसी नाले किनारे पड़ी मिलती। और हर तरह की यौन उत्पीड़न की घटना के बाद यह पुरुष प्रधान समाज उल्टा लड़की कके ही चरित्रहनन पर उतारू हो गया है।

भारत के सभी भाई आज अपनी बहनों से राखी बंधवाकर उन्हें उनकी सुरक्षा का वचन देंगे। जैसे कि बहनें जिंदा इंसान न होकर कोई सामान या वस्तु होंय जो अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकती। लेकिन क्या वो देश की सभी बहन बेटियों को एक सुरक्षित माहौल, एक आजाद जिंदगी देने की कल्पना कर सकते हैं। नहीं, असल में भारत में लड़कियों की सुरक्षा का मतलब ही उनकी जिंदगी और उनकी गतिशीलता पर पहरे बिठाना है। हर भाई यह ध्यान रखता है कि उसकी बहन कहाँ जाती है, क्या करती है, कहीं वो परिवार की नाक न कटवा दे। बहन की सुरक्षा दरअसल उसके यौनांगों की सुरक्षा से जुड़ी है, परिवार की इज्जत से जुड़ी है।

यही भाई जो अपने घरों में राखी बंधवाकर अपनी बहनों को उनकी सुरक्षा का वचन देते हैं, थोड़ी देर बाद बाहर किसी और लड़की की सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं। भूखे भेड़िये की तरह सड़कों पर लार टपकाये घूमते हैं। जंगलों में, वीरान इलाकों में महिलाएं खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं लेकिन आज उन्हें सबसे ज्यादा खतरा इन सभ्य और संस्कारी मर्दों से ही है। शायद ही किसी अन्य देश मे बहनों को यूँ भाइयों से सुरक्षा के आश्वासन के वचन की जरूरत पड़ती हो। कितना ढपोरशंखी है हमारा समाज।


जो भाई आज बड़े प्यार से शुभकामना संदेश भेज रहे हैं और बहनों से राखी बंधवाकर उन्हें हर दुख दर्द से उनकी सुरक्षा का वचन दे रहे हैं। जब यही लड़कियां अपनी मर्जी से अपने जीवन साथी का चुनाव करने का फैसला लेती हैं तो वही भाई उनका गला दबा देते हैं, उन्हें और उनके प्रेमी को कुल्हाड़ी से काट डालते हैं। तब उनके हाथ नहीं कांपते जिन पर उनकी बहनों द्वारा प्रेम सूत्र बांधा गया था। तब उनका गला दबाते उनके दिलों में प्यार की तरंगें क्यो नहीं उठती। तब उन्हें अपनी बहन की सुरक्षा का वचन याद क्यों नहीं आता। तब वो अपनी बहन को सबक सिखाने वाले अपराधी क्यों बन जाते हैं। दरअसल ऐसे त्यौहार घरों से ही बचपन से ही लड़के लड़कियों को पितृसत्ता की ट्रेनिंग देने के माध्यम हैं। यह त्यौहार लड़कियों को बचपन से ही अबला, कमजोर और बेबस बनने की ट्रेनिंग देते हैं कि तुम्हारी रक्षा की जिम्मेवारी एक मर्द की ही है और पितृसत्ता के इसी दायरे में तुम्हें सम्मान हासिल हो सकता है। दरअसल यह एक सामंती त्यौहार है जो पितृसत्ता की जड़ों को और मजबूती प्रदान करता है।

क्या फेसबुक व्हाटसअप ट्विटर को रक्षाबन्धन के बधाई सन्देशों से भर देने वाले यह संस्कारी फौज आज अपनी बहनों को खुला आसमान देने की कोशिश करेगी। देखते हैं कितने भाई उन्हें अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी जीने, अपना कैरियर चुनने व जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता देंगे। बहनों आपको भाई बाप के प्यार स्वरूप मात्र एक छोटे से गिफ्ट से संतुष्ट नहीं होना है वरन उनसे अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़नी है, पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार की लड़ाई लड़नी है और अगर आप ऐसा करती हो तब पता चलेगा कि कितने भाइयों का प्यार सच्चा है। रक्षा बंधन का यह त्यौहार तभी सार्थक होगा जब बहनों को उनका हक मिलेगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

 

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved