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मूवी आर्टिकल-15 को लेकर यूपी में दलित और ब्राम्हणो के बीच हंगामा

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(image credits: Jagran Josh)

हम सभी जानते है की पिछड़ी जातियों के साथ आज भी गैरो जैसा बर्ताव किया जाता है। पिछड़ी जातियों पर हो रहे अत्याचार को लेकर प्रशासन भी कुछ नहीं कर पाता। वही अगड़ी जाति वालो का पिछड़ी जाति पर हमेशा से दबदबा बना रहा है। पिछड़ा समाज हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है जिसमे लोगो के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। ऐसे ही मुद्दे को दर्शाती एक फिल्मं 28 जून को सिनेमाघरों में लगाईं गई जिसका नाम आर्टिकल-15 है।

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इस समय आर्टिकल-15 फिल्म को लेकर यूपी में काफी बड़ा हंगामा मचा हुआ है। इस फिल्म जातिवाद से जुड़े कई बड़े मुद्दे सामने रखे गौए है। इस फिल्म मे दलितों के साथ हो रहे भेदभाव को दर्शाया गया है। यूपी इस फिल्म को लेकर काफी गहमा गहमी हो रही है। जहां ब्राम्हण जाति के लोग इस फिल्म को सिनेमाघरों से हटाने पर लगे है वही दलित जाति के लोग इसे वापस से सिनेमाघरों में लगाने की मांग कर रहे है। हालांकि यूपी प्रशासन ने मुद्दे को देखते हुए फिल्म को थिएटर से हटा दिया है। परन्तु सिनेमाघर के टिकट काउंटर पर दलितों का जमावड़ा लग रहा है। फिल्म को दुबारा लगाने जाने की मांग की जा रही है।

कई जगहों पर सिनेमाघरों के मालिकों ने तोड़ फोड़ के डर से फिल्म के पोस्टर भी नहीं लगवाए। आंदोलन करने वाले लोगो ने फिल्म को बंद करा दिया। सड़को पर भी इस फिल्म को लेकर प्रदर्शन किये जा रहे है। इस फिल्म में कुछ आपत्तिजनक दृश् है जो लोगो को अंदर से झिंझोड़ देती है।

आइये हम आपको पूरी कहानी बताते है की आखिर क्यों आर्टिकल-15 जैसी फिल्म को लेकर यूपी में ब्राम्हण समाज और दलित समाज के बिच तनाव पैदा हो रहा है। दरअसल इस फिल्म में दलित समाज से जुड़े कई मुद्दे सामने रखे गए है। 2014 में यूपी के कटरा शहादतगंज के बदायूं में 2 दलित बहनो के साथ हुए दुष्कर्म को इस फिल्म में दिखाया गया है। इस फिल्म में कई ऐसी स्टोरी है जो यूपी में हुई घटनाओ पर आधारित है। वहीँ ऊना में हुए दलित उत्पीड़न को लेकर भी दृश्य इस फिल्म में दिखाया गया है।

इस फिल्म में दलित और ब्राम्हणो के बिच कितना बड़ा फासला है यह तो फिल्म देखने के बाद ही आपको पता चलेगा। आज के समय में भी किस प्रकार से दलितों के साथ अत्याचार हो रहा है, उन्हें किस प्रकार समाज से अलग रखा जा रहा है इस तरह के गंभीर मुद्दे दिखाए गए है। पिछड़ी जातियों के हाथ का पानी भी नहीं पिया जाता।


वहीँ इस फिल्म में जाति से ऊपर सोचने वाले पुलिस अधिकारी का अभिनय भी काफी चर्चा में है। अगड़ी जाति होने के बाद भी दलितों के साथ अच्छा व्यवहार और दोनों लड़कियों को इन्साफ दिलाने के लिए जान पर खेल जाना इस तरह का अभिनय लोगो को काफी पसंद आ रहा है। सामजिक मुद्दे की पूरी तरह से पोल खोलती यह फिल्म काफी चर्चा में है। फिल्म में यह भी दर्शाया गया है की पुलिस भी किस प्रकार पिछड़ी जातियों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करते है।

इस फिल्म को देखने के बाद आप भी यही सोचेंगे की आखिर आज के जमाने में भी इस प्रकार के भेदभाव क्यों है। ब्राम्हणो और दलितों के मुद्दे पर बनायी गयी आर्टिकल-15 समाज की मानसिकता कोदर्शाती है। इसी के चलते ब्राम्हण जाति के लोगो ने इस फिल्म पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है की इस फिल्म में अगड़ी जातियों को बारे में गलत दिखाया गया है। इससे समाज को ब्राम्हण जाति के खिलाफ गलत सन्देश जाएगा। वहीँ दलित समाज के लोगो का कहना है की आज भी समाज में उनके साथ भेदभाव हो रहा है और इस फिल्म के जरिये वह मुद्दा उठाया गया है। दलित समाज के लोगो ने इस फिल्म को वापस सिनेमाघरो में लगाने की मांग की है।

यूपी में आर्टिकल-15 की रोक पर एक्टर्स ने भी जवाब दिया है और कहा है की यह सामाजिक मुद्दे पर आधारित फिल्म है। इस फिल्म को दर्शको तक लोगो तक पहुँचाना चाहिए ताकि पिछड़ी जातियों के साथ हो रहे भेदभाव को पूरा समाज देखे और समझे की यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है।

अगर आप नहीं जानते की आर्टिकल-15 क्या है तो हम आपको बता दे की इस फिल्म का नाम भारत के सविंधान अनुच्छेद आर्टिकल-15 से लिया गया है। बाबा साहब आम्बेडकर ने संविधान के आर्टिकल-15 में लिखा था की कोई भी राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। परन्तु इस संविधान से हट कर लोग आज भी भेदभाव कर रहे है। आज भी पिछड़े वर्ग के लोगो के साथ दुर्व्यवाहर जारी है। इसी मुद्दे पर बनायीं गयी यह फिल्म दर्शको को अंदर से सोचने पर मजबूर करती है।

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