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“No Laughing Matter: The Ambedkar Cartoons, 1932-1956” पर टिप्पणी

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(image credits: indianexpress)

कभी कभी कार्टून का प्रयोग करके लेखक द्वारा देश में चल रही स्थितियों की दशा यह फिर किसी एक व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी की जाती है। लेखक कार्टून का सहारा लेकर किसी व्यक्ति य फिर किसी व्यवस्था को बताने की कोशिश करता है। इसी तरह कार्टून का इस्तेमाल को लेकर आजादी से लेकर अबतक कई बदलाव देखे गए है।

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आज हम उन्नामती सैयामा सुंदर द्वारा लिखी गई भीमराव अम्बेडकर पर पुस्तक “No Laughing Matter:The Ambedkar Cartoons, 1932-1956 के बारे में बात करेंगे। किताब में अंबडेकर पर समाचार प्रसंग और दृश्य सामग्री का विश्लेषण करने के साथ – नायक के खिलाफ जाति पूर्वाग्रह का मामला बनाने के लिए, विषयो पर 122 कार्टून प्रस्तुत किये है।

दरअसल यह पुस्तक 1932-1956 तक बाबा साहेब पर बनाये गए कार्टूनों पर टिप्पणी की तरह है। जिसमे दिखाया गया है किस तरह भीमराव आम्बेडकर के अच्छे कामों की भी जातिय आधार पर तुलना की गयी है। किस तरह 1932-1956 तक कार्टूनिस्टों ने बाबा साहेब के कद को हमेशा छोटा दिखाया है।

यह पुस्तक स्वतंत्र भारत के शुरुआती कार्टूनिंग पर एक अच्छी कड़ी नज़र रखती है। लेकिन यह उन पाठकों के लिए परेशान करने वाला हो सकता है जो मानते हैं कि कोई कार्टून गलत नहीं कर सकता। जैसा कि आप पृष्ठों को मोड़ते हैं, आपको बहुत कुछ सही भी दिखाई भी देता हैं, लेकिन संदेश देने के लिए किसी व्यक्ति विशेष पर कार्टून का इस तरह इस्तेमाल करना उचित नहीं है।

यह किताब खुद एक बड़े कार्टून की तरह काम करती है। एकतरफा, प्रतिकूल, और असुरक्षित रूप में दिखाई देती है। कार्टूनिस्ट शिकायत नहीं कर सकते। उन्हें खुद की दवा का स्वाद मिल रहा है। एक कार्टूनिस्ट और रिसर्च स्कॉलर, लेखक ने इसमें इतना पंच डाला है कि आप चौंक जाते हैं।


पुस्तक में आप लगातार आंबेडकर की परेशान करने वाली छवियों को देखते हैं जो की एक प्रवृत्ति से भी जोड़ता है। देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता भीम राव आम्बेडकर को निश्चित रूप से फ्रेम में सबसे छोटा व्यक्ति दिखाया गया है। और देखने वाली बात यह है की जब भीमराव आम्बेडकर की अच्छे काम के लिए प्रशंसा करनी चाहिए, तो उन्हें मनु के पुजारी के रूप में बताया गया है। यहाँ भी उनके कामों को एक खास जाति से जोड़कर देखा गया।

जब वह मसौदा संविधान के तीसरे वाचन के रूप में एक कार्य को सराहनीय मानते हैं, तो उन्हें कलियुग का भीम कह दिया जाता है। जब उन्होंने युद्ध के बाद के महिलाओं को कार्यबल में लाकर कोयले के उत्पादन को पुनर्जीवित किया, तब भी उनको गलत करार दिया गया।

चित्रकारिता में गांधी लगातार बढ़े दिखाए गए और वहीं अम्बेडकर को देखने से लगता है की वह कभी बड़े ही नहीं हुए। उनको हमेशा छोटा दिखाने की कोशिश की गई। जब भी दोनों में बहस होती थी, जो अक्सर होती थी, मजाक में लगभग हमेशा उन्हें चुनौती दी जाती थी।

कार्टून विद्वान कॉलिन सीमोर-उरे के इस पर कहते है की, अखबार में कार्टून की उपस्थिति 18 वीं शताब्दी के अंत तक बनी रही। कला के इतिहासकार एर्न्स्ट गोमब्रिच का हवाला देते हुए उन्होंने कहा “यह सादगी उच्च और निम्न, प्रकाश और अंधेरे, बड़े और छोटे जैसे सार्वभौमिक विरोधाभासों के माध्यम से प्राप्त की गई है। “

इन सभी दशकों के बाद, हम अभी भी संस्थापक पिता के साथ नहीं हैं। जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और “चतुर बनिया” खुद समकालीन कार्टून में दिखाई देते हैं। अम्बेडकर एक बढ़ती हुई उपस्थिति है। वह दिखाई देते हैं हाथ में पुस्तक लिए, ऐसा लगता है की स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी और न्याय को एक ही में मिलाया गया हो। देखा जाये तो आज के कार्टूनिस्ट पूर्वजो की गलतियों में संशोधन करते दिखते हैं। परन्तु प्रोटेस्ट आर्ट को विरोध की राजनीति के साथ आपस में मिल जाना चाहिए।

इन सभी बातो से चलता है की भीमराव आंबेडकर के अच्छे कामों को भी ठीक ढंग से नहीं दिखाया गया। हमेशा उनके वयक्तित्व को दुसरो से कम दिखाने की कोशिश की गई।

अब अंत में हम यहां एक और महत्वपूर्ण बात पर गौर करते है, आपको बता दे की कार्टूनों के गलत इस्तेमाल को देखते हुए, मई 2012 में सदन की 60 समारोह के दौरान लोकसभा के सभी तो नहीं परन्तु दो सांसदों ने उपस्थित होकर एक पाठ्य पुस्तक से कार्टून हटाने की कार्रवाई शुरू की। लेकिन अब हमारे पास यह किताब है, जो उन्ही तरह के कार्टूनों से भरी हुई है।

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