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दलित महिलाओं का लोगो ने किया विरोध, इस वजह से दोनों महिलाओं का हुआ ट्रांसफर

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(image credits: the hindu)

आज भी समाज में भेदभाव का दौर जारी है चाहे वह समाज हो या धर्म भेदभाव हर जगह है। गौर किया जाए तो समाज में भेदभाव सबसे अधिक है। गुजरते समय के साथ जहाँ जाति भेदभाव को ख़त्म होना चाहिए था वहीँ लगातार यह बढ़ता दिख रहा है। ज्यादातर भेदभाव से जुडी घटनाएं गाँवों जैसे क्षेत्र से आती है। लोगो की मानसिकता यह दिखाती है की आज भी वह उसी पुराने समाज में जी रहे है जहां पहले लोगो को अपनों से छोटा समझा जाता था।

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एक बार फिर से छोटी सोच दर्शाने वाली खबर सामने आयी है जहाँ एक स्कूल में बच्चो के लिए खाना बनाने वाली महिला का सिर्फ इसलिए ट्रांसफर किया गया क्यूंकि वह दलित समाज से थी। आय दिन दलितों के साथ हो रही घटना सामने आती रही है। उच्च समाज के लोगो को यह गवारा नहीं की उनके समाज में दलित समुदाय के लोग भी शामिल हो। चाहे शादी हो या फिर मंदिरो में दर्शन की बात हर जगह दलित समाज पर रोक लगायी गयी है। आज के समय में भी इस प्रकार की खबरे लोगो की छोटी मानसिकता और उनके लोगो के प्रति बुरे व्यवहार को दर्शाती है।

तमिलनाडु से आई इस ख़बर से आज के समाज की ओछी मानसिकता का पता चलता है कि माँ-बाप अपने बच्चों को आख़िर क्या शिक्षा देंगे जब उन्हें किसी महिला द्वारा भोजन बनाना तो छोड़िए, उस जगह पर खड़े होने पर भी समस्या है। ज्योतिलक्ष्मी और अन्नलक्ष्मी नाम की दो महिलाओं को उनके दलित समाज से आने के कारण, ग्रामीणों के विरोध के बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया।

द हिन्दू की एक ख़बर के अनुसार, 3 जून को, एम अन्नालक्ष्मी को मदुरै कलेक्टर के कार्यालय से एक निर्देश मिला, जो उनके गाँव वालयापट्टी में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में उनकी नियुक्ति से जुड़ा था। दरअसल, अन्नलक्ष्मी, एक अनुसूचित जाति की महिला हैं, जिनकी नियुक्ति आंगनवाड़ी केंद्र में एक सहायक और रसोइया के रूप में हुई थी। अगले ही दिन ज़िला प्रशासन द्वारा अन्नलक्ष्मी का तबादला पास के गाँव किलवनरी में कर दिया गया। वहीं एक अन्य दलित महिला ज्योतिलक्ष्मी का तबादला मादीपनुर में कर दिया गया।

अन्नलक्ष्मी का कहना है की, “गाँव के हिन्दू तिरुमंगलम तालुक के ICDS कार्यालय गए थे जहाँ उन्होंने कहा कि उनके बच्चे SC महिला द्वारा बनाये गए खाने को कभी नहीं खाएँगे।” आज हम जिस समय और युग में जी रहे है, इस प्रकार का भेदभाव समझ के बाहर है ।बात हद से आगे जब बढ़ जाती है जब कोई मामला इतना संगीन हो जाए कि जान पर बन पड़े।


ख़बर के चलते, 8 जून को, दलित कॉलोनी में हंगामा हो गया हो। उनके इलाक़े में हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम दिया गया। जब दलित शिकायत दर्ज करने के लिए नागायापुरम थाने गए, तो कुछ हमलावरों ने उनके घरों में घुसकर बिजली मीटर के बक्से, दरवाज़े और वाहन तोड़ दिए। यहाँ तक कि उनके पशुओं पर हमला भी किया। इस झड़प में कुछ लोग गंभीर रूप से घायल भी हो गए।

इस घटना पर ज्योतिलक्ष्मी ने कहा, “कितने दु:ख की बात है कि मैं अपने ही गाँव में काम करने में असमर्थ हूँ।” ऐसे हिंसक माहौल को देखना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। ख़ासतौर पर तब, जब सज़ा किसी ऐसी ग़लती की मिले जो की ही न गई हो। फ़िलहाल स्थिति यह है कि दोनों महिलाएँ अब अकेले घर जाने तक से डरती हैं।

ज्योतिलक्ष्मी ने बताया कि उन्हें 4 जून को अपने गाँव की आंगनवाड़ी में न जाने के लिए कहा गया था। उन्होंने बताया की, “मैं एक मेडिकल परीक्षा के बाद एक प्रमाण-पत्र जमा करने के लिए गई थी, जो काम शुरू करने के लिए तैयार किया गया था। लेकिन वहाँ के अधिकारी ने मुझे बताया कि मेरे गाँव के कई पुरुष और महिलाएँ हमारी नियुक्ति के विरोध में आए थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से अधिकारी से कहा था कि वे दलितों द्वारा तैयार भोजन को कभी नहीं छूएँगे।”

दोनों महिलाओं के अनुसार, यह भेदभावपूर्ण रवैया उस वक़्त खुलकर सामने आया जब अप्रैल में दलितों को स्थानीय मुथलम्मन मंदिर उत्सव में पूजा करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा, “पुरुषों ने हमें मंदिर के बाहर तक नारियल तोड़ने की अनुमति नहीं दी।”

इस मामले की जाँच पेरियार डीएसपी टी मथियालगन कर रहे हैं। अब तक 11 आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। पुलिस ने SC/ ST एक्ट , 1989, और IPC के तहत मामले दर्ज किए हैं।

इस मामले पर कलेक्टर एस शांता कुमार ने बताया कि उन्होंने अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ 11 जून को गाँव का दौरा किया। उन्होंने कहा, “कोई भी शख़्स अब अपने काम पर वापस जा सकता है और जहाँ तक ज़िला प्रशासन का सवाल है, उसकी कार्रवाई अब बंद है।” फ़िलहाल, दोनों महिलाओं को अभी तक अपने उच्च अधिकारियों से वालयापट्टी में बहाली के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली है।

आज भी लोगो की ओछी मानसिकता हैरान कर देती है। खास तौर पर इस तरह की खबरे जहाँ महिलाओं का सम्मान ही न किया जाये। शिक्षित क्षेत्रों में भी इस प्रकार की खबरे सामने आने लगी है। ऐसा लगता है समाज सिर्फ भेदभाव का ज्ञान लोगो तक पहुंचा रहा है और दलित जैसे समाज से नफरत करना सीखा रहा है।

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