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अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े से पूछे कई सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने दिए यह आदेश

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(image credits: hindustan times)

अयोध्या मामले में दलीलों का दौर जारी है और ऐसी दलीले पेश की जा रही जिसे सुन कर नतीजे तक पहुंचना और भी मुश्किल होता जा रहा है। वही कहा जा रहा है की निर्मोही अखाडा बढ़ा चढ़ा कर दावे पेश कर रहा है। पिछली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने कहा था की फैसला लोगो की भक्ति को नजर में रखते हुए कानूनी तौर पर किया जाए।

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मुस्लिम पक्षकारों के उन आरोपों का संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया कि निर्मोही अखाड़ा के कई गवाहों ने अपनी गवाही में ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ दावे’ किये। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उनसे पूछा कि क्या वे इसके बावजूद अयोध्या में विवादित भूमि पर उनका अधिकार स्वीकार करते हैं।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस ए नजीर की पीठ ने वरिष्ठ वकील राजीव धवन की दलीलों पर विचार किया कि अखाड़ा ने अपने वाद के पक्ष में जिन गवाहों का परीक्षण किया उनके बयानों में ‘बेतुकापन’ और ‘झूठ लग रहा है।

राजीव धवन इस मामले की सुनवाई में मौजूद थे। वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘‘किसी ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा 700 साल पहले अस्तित्व में आया तो कुछ ने कहा कि यह 250 साल पहले वजूद में आया। एक गवाह ने कहा कि भगवान राम 12 लाख वर्ष पहले आये थे।’’

राजीव धवन ने कहा कि एक गवाह, जिसने 200 से अधिक मामलों में गवाही दी है, उसका मानना था कि अगर कोई जगह जबरन छीन ली गई है तो ‘‘झूठ बोलने में कोई बुराई नहीं है।’’


पीठ ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में सुनवाई के 20 वें दिन कहा कि अगर निर्मोही अखाड़ा के ‘शेबैत यानि प्रबंधन अधिकारों’ को स्वीकार कर लिया गया, तो उनके सबुत भी स्वीकार कर लिए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के एक फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है। हाईकोर्ट ने चार दीवानी मुकदमों पर अपने फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से विभाजित करने का फैसला सुनाया था। 

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