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भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले इस जज के आदेश को दूसरे जजों ने किया ख़ारिज

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(image credits: livebihar.live)

जस्टिस राकेश कुमार ने बीते बुधवार को पारित अपने एक आदेश में हाईकोर्ट और न्यायिक प्रणाली में कथित जातिवाद और भ्रष्टाचार पर अपनी चिंता व्यक्त करने के अलावा निचली न्यापालिका में भ्रष्टाचार के आरोप पर सीबीआई जांच के आदेश भी दिए थे। राकेश कुमार का कहना था की भ्रष्टाचारियों के साथ कुछ बड़े अधिकारी मिले होते है जिनकी वजह से उन्हें सजा से मुक्ति मिल जाती है ऐसे में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इसी मामले के चलते राकेश कुमार के दिए आदेशों को जजों की पीठ ने ख़ारिज कर दिया है। 

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पटना हाईकोर्ट के 11 जजों की पीठ ने एक असाधारण कार्रवाई में एक दिन पहले जज जस्टिस राकेश कुमार द्वारा पारित एक आदेश को बीते गुरुवार को निलंबित कर दिया, जिसमें कुमार ने हाईकोर्ट और संपूर्ण न्यायिक प्रणाली में कथित जातिवाद और भ्रष्टाचार पर अपनी चिंता व्यक्त की थी।

इसके अलावा 11 जजों वाली पीठ ने यह भी फैसला किया कि एकल न्यायाधीश के आदेश की सामग्री को कहीं भी प्रसारित नहीं किया जाएगा और उनके आदेश को आगे की कार्रवाई के लिए प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के पास रखा जाएगा। जस्टिस कुमार ने यह आदेश भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोपी पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमैया को एक सतर्कता अदालत द्वारा जमानत दिए जाने पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दिया था। 

राकेश कुमार ने 23 मार्च 2018 को रमैया की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद सतर्कता अदालत में आत्मसमर्पण करने पर उनको अवकाश प्राप्त जज से जमानत मिली थी। बिहार हाईकोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज कुमार ने हाईकोर्ट द्वारा रमैया की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद सतर्कता कोर्ट के जज द्वारा उन्हें जमानत दिए जाने पर गहरी चिंता जाहिर की थी। 

लाइव लॉ के मुताबिक, उन्होंने कहा कि यह बेहद असाधारण स्थिति है जहां रमैया जैसे ‘भ्रष्ट अधिकारी’ ने नियमित जज के बजाय एक अवकाश प्राप्त जज से जमानत प्राप्त कर ली।


इसके अलावा जज कुमार ने साल 2017 में रिपब्लिक टीवी द्वारा चलाए गए ‘कैश फॉर जस्टिस’ वीडियो मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया। वीडियो में पटना सिविल कोर्ट के कुछ अधिकारियों द्वारा फैसला कराने के लिए रिश्वत लेते हुए दिखाया गया है।

कुमार ने अपने आदेश में लिखा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने और मामले की जांच कराने के आदेश दिय जाये। जस्टिस कुमार ने इस संबंध में कार्रवाई नहीं होने पर गहरी निराशा जताई और सीबीआई जांच के आदेश दिए।

उन्होंने अपने आदेश में लिखा, ‘आमतौर पर मैं ऐसा आदेश पास न करता, लेकिन पिछले कुछ सालों से इस कोर्ट ने नोटिस किया है कि पटना कोर्ट में चीजें ठीक तरीके से नहीं चल रही हैं।’

कुमार ने आगे लिखा, ‘हाईकोर्ट की ये जिम्मेदारी थी कि वे मामले में एफआईआर दर्ज कराते और एक स्वतंत्र जांच एजेंसी से इसकी जांच कराई जाती। दुर्भाग्य से इस कोर्ट ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की। इस कोर्ट का जज होने के नाते मैंने मौखिक रूप से कई जजों के सामने मामले को उठाया और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश से इस संबंध में बात भी की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।’ इसलिए जस्टिस राकेश कुमार ने एफआईआर दर्ज करने और इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए।

जस्टिस कुमार यहीं पर नहीं रूके. उन्होंने अपने कई साथी जजों की आलोचना की और उनके द्वारा किए गए कार्यों पर सवाल उठाया. जज ने कहा कि उन्हें पता है कि किस तरह जमानत याचिकायों में हेरफेर की जाती है। उन्होंने कहा, ‘इस हाईकोर्ट में भष्टाचार एक खुला राज है। ’उन्होंने ये भी कहा कि जज सही न्याय देने के बजाय विशेषाधिकार का आनंद लेने में ज्यादा रुचि लेते हैं। जज जनता के करोड़ों रुपये को अपने बंगले के नवीकरण में खर्च कर देते हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि कई जज अपने पसंदीदा या अपनी जाति के लोगों या भ्रष्ट न्यायिक अधिकारियों को जज बनाने के लिए मुख्य न्यायाधीश की तारीफ करते हैं।

कुमार ने तीखी टिप्पणी करते हुए अपने फैसले में लिखा, ‘अगर मैं ये सब देखते हुए भी चुप बैठ जाता हूं तो मैं कभी भी अपने आप को मांफ नहीं कर पाऊंगा। मेरा मानना है कि सिर्फ न्यायपालिका का सम्मान बचाने के नाम पर हमें भ्रष्टाचार को छिपाना नहीं चाहिए। नहीं तो न्यायिक प्रक्रिया से जनता का भरोसा उठ जाएगा।’

यहां तक की राकेश कुमार ने अपने आदेश को भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय कानून मंत्रालय को भी फॉरवर्ड किया है।कुमार को 26 साल की वकालत के बाद 2009 में जज बनाया गया था. वो हाईकोर्ट से 31 दिसंबर 2020 को रिटायर होंगे।

इससे पहले पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अदालत की रजिस्ट्री में प्रकाशित एक नोटिस में कहा गया था कि जस्टिस कुमार के समक्ष निलंबित सभी मामले तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाते हैं तथा कोर्ट मास्टर को यह निर्देश दिया जाता है कि वह बताएं कि किन परिस्थितियों में निष्पादित किया जा चुका मामला अदालत के समक्ष सुनवाई के लिए लाया गया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने वाले को हमेशा ही रोक दिया जाता है। यहाँ भी कुछ ऐसा ही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आदेश पारित करने वाले जज जस्टिस राकेश कुमार के पारित को जजों ने ही ख़ारिज कर दिया। अब इन सभी बातो से यही मालुम होता है की भ्रष्टाचार, ईमानदारी से कई ज्यादा ताकतवर है 

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