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सरदार वल्लभ भाई पटेल पर बीजेपी नेता के इस दावे को इतिहासकार ने बता दिया गलत, कही यह बात

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(image credits: ndtv)

बीजेपी नेता कभी कभी इतिहास में हुये कुछ घटनाओ को लेकर कुछ ऐसे दावे कर देते है, जो कभी गलत शाबित हो जाते हैं। दरअसल जम्मू कश्मीर को लेकर बड़ा फैसला लेने के बाद मौजूदा सरकार सुर्खियों में है। केंद्र की बीजेपी सरकार का कहना है की कश्मीर को भारत से जोड़ने का जो काम दशकों पहले अधूरा रह गया, उसे गृह मंत्री अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी की टीम ने पूरा कर दिया है।

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वहीं इसके साथ ही मौजूदा सरकार कश्मीर को लेकर अक्सर यह दावे करती आई है की, 552 रियासतों का भारत में विलय कराने वाले पटेल और जवाहर लाल नेहरू कश्मीर के मुद्दे पर एक राय नहीं रखते थे। परन्तु इतिहासकार ने बीजेपी के इस दावे से असहमति जताया है।

बीते सोमवार को संसद में अनुच्छेद 370 पर हुई बहस के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने नेहरू पर निशाना साधा था। उन्होंने जम्मू कश्मीर की समस्या के लिए प्रथम प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि नेहरू ने तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को जम्मू कश्मीर के मुद्दे से निपटने की स्वतंत्रता दे दी होती और हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ‘‘ना 370 का बखेड़ा होता और ना पीओके होता।’’

वहीं, जम्मू से बीजेपी सांसद जुगल किशोर शर्मा ने आरोप लगाया था कि नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के कहने पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35 ए लागू किया। उनके मुताबिक, पटेल के अलावा बीआर अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया था।

परंतु बीजेपी सांसद का यह कहना है की पटेल 370 के खिलाफ थे। उनके इस बात से इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने अहसमति जताई है। हरियाणा के अशोका यूनिवर्सिटी से इंटरनैशनल रिलेशंस और इतिहास के प्रोफेसर राघवन का यह मानना है कि इस बात के सबूत हैं कि पटेल ने आर्टिकल 370 का पूरी तरह समर्थन किया। अंग्रेजी अखबार द टेलिग्राफ से बातचीत में राघवन ने कहा कि आर्टिकल 370 पूरी तरह सरदार पटेल की विचार था और इस मुद्दे पर उनके विचारों को दूसरों के मुकाबले ज्यादा अहमियत मिली।


राघवन ने कहा, ‘यह कहना मूर्खता है कि सिर्फ नेहरू ने इसे लागू किया क्योंकि यह सरकार का अकेला नीतिगत फैसला नहीं था। इसे संविधान सभा ने पास किया था। राघवन के अनुसार, आर्टिकल का ड्राफ्ट तैयार करने को लेकर पहली बैठक 15 और 16 मई 1949 को पटेल के घर पर हुई, जिसमें नेहरू भी मौजूद थे।

प्रोफेसर ने आगे बताया जम्मू-कश्मीर के पीएम शेख अब्दुल्ला से बातचीत करने वाले मंत्री एनजी आयंगर ने नेहरू की ओर से अब्दुल्ला को भेजे जाने वाले लेटर का ड्राफ्ट तैयार किया तो उन्होंने इसे पटेल के पास एक नोट के साथ भेजा था। आयंगर ने पटेल को लिखा था, ‘क्या आप जवाहरलालजी को सीधे बताएंगे कि इस पर आपकी रजामंदी है? वह यह चिट्ठी पर आपकी सहमति के बाद ही इसे शेख अब्दुल्ला को भेजेंगे।’

वहीं, जब नेहरू विदेश में थे, पटेल ने आयंगर से कहा था कि वह अब्दुल्ला से बातचीत जारी रखें। अब्दुल्ला ने कहा था कि कश्मीर में मूलभूत अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धांतों के लिए भारतीय संविधान को स्वीकार करने का फैसला संविधान सभा पर छोड़ देना चाहिए। दूसरी और सरदार पटेल कश्मीर पर अब्दुल्ला की राय से सहमत नहीं थे, इसके बावजूद नेहरू के वापस लौटने पर उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री से कहा था कि वह कांग्रेस को इस रुख पर सहमत करने में कामयाब हुए हैं।

कुछ बीजेपी नेता बिना जाने समझे इतिहास को लेकर को कोई भी दावे कर देते है। जो की उचित नहीं लगता है। उन्हें इतिहास के सन्दर्भ में कोई भी बयान देने से पहले थोड़ी शोध कर लेनी चाहिए ,जिससे को वह अपने दावों को सही शाबित कर पाए।

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