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जानिए कैसे RSS की चालो से दलित समाज में BJP को मिली जीत

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(image credits: DNA India)

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में मिली बड़ी सफलता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस की बनाई गई रणनीति ने दिलाई। आरएसएस ने मायावती के परंपरागत वोट बैंक दलितों के लिए एक अलग से एजेंडा तैयार किया था। इस एजेंडे में न सिर्फ आरएसएस के दलित प्रचारक शामिल किए गए थे, बल्कि बौद्ध धर्मावलंबी भिक्षुओं और दलित बुद्धिजीवियों का भी सहारा लिया गया था।

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इन सब रणनीतियों के चलते ही बीजेपी आज जीत पायी है परन्तु इन सबसे यह साफ़ जाहिर है की किस प्रकार आरएसएस ने दलित वर्ग के लोगो को बेवकूफ बना कर बीजेपी को वोट दिलवाया है। बीजेपी को दलित समाज से कोई लेना देना नहीं है परन्तु चुनावी माहौल में आरएसएस के सहारे उन्होंने यह जताने की कोशिश की है वह दलित वर्ग के लोगो के साथ है और उनके हित में काम करना चाहते है।

समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन कर दलित और पिछड़ा वोट बैंक को अपनी तरफ करने की कोशिश की थी, परन्तु आरएसएस के झूठे वादो, चालो से और अपनी कामयाब रणनीतिक चौसर के दम पर धराशायी कर दिया। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 80 में से 71 सीटों पर कब्जा किया था।

इस बार उसे सपा और बसपा से कड़ी टक्कर मिलने का अनुमान लागाया जा रहा था, लेकिन सुरक्षित सीटों के लिए तैयार आरएसएस की घिनौनी रणनीतिक पैंतरेबाजी ने सुरक्षित सीटों पर सपा-बसपा गठबंधन को मात दे दी। विपक्षी दल हालांकि अनुमान था कि भाजपा और संघ की रणनीति कार्य नहीं कर पाएगी, लेकिन चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि बेईमानी से अगर जीतना है तो कोई आरएसएस के रणनीतिकारों से संपर्क करे।

आरएसएस से जुड़े एक शख्स की मानें तो आरएसएस के सर्वे में उत्तर प्रदेश में सुरक्षित सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी को बदलने का फॉर्मूला बनाया गया था। और यह कारगर साबित हुआ। सूबे की 17 सुरक्षित सीटों में से भाजपा ने इस बार 10 सीटों पर मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए थे और नए चेहरों को मैदान में उतारा था। इन सभी सीटों पर भाजपा को जीत हासिल हुई।


आरएसएस के कहने पर भाजपा ने 10 सुरक्षित सीटों- हाथरस, आगरा, शाहजहांपुर, हरदोई, मिश्रिख, इटावा, बाराबंकी, बहराइच, मछलीशहर और राबट्र्सगंज में प्रत्याशी बदले थे। जहां पर प्रत्याशी नहीं बदले गए, वहां पर भाजपा को सफलता नहीं मिल सकी। नगीना सुरक्षित सीट से यशवंत सिंह और लालगंज सीट से नीलम सोनकर को दोबारा प्रत्याशी बनाया गया था। दोनों ही चुनाव हार गए हैं। यहाँ भी भाजपा और आरएसएस ने मिल कर लोगो के दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया और जीत हासिल की।

आरएसएस के एक पदाधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया की , आरएसएस चुनाव से पहले भी दलित और अनुसूचित वर्ग के बीच काम करता रहा है। लेकिन इस बार एक खास रणनीति बनाई गई थी। उप्र की 80 लोकसभा सीटों पर हमारे बड़े पदाधिकारियों ने दलितों और शोषितों के बीच काम करने वाले उन लोगों के नाम मांगे थे, जो अपने समाज का प्रतिनिधित्व करते हों। इसके बाद उसी वर्ग के डॉक्टर, प्रोफेसर और बौद्धिक वर्ग को अपने क्षेत्रों में जागरूकता के लिए लगाया गया।

देखा जाए तो आरएसएस ने उन लोगो पर निशाना साधा है जो समाज का प्रिनिधित्व करते है और उनको फुसला कर वोट हासिल किये। क्या यह सच है की आरएसएस का कोई सदस्य दलित वर्ग के बिच काम कर रहा था या फिर पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए सिर्फ एक कहानी का इस्तेमाल किया। परन्तु बीजेपी और आरएसएस की बड़ी और गिरी हुई चालो के चलते सपा-बसपा गठबंधन को मात दे दी। वही अब दलितों का भविष्य भी असुरक्षित हाथो में हैं।

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