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मोदी सरकार ने क्यों लिया सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला, क्या संविधान में इसकी इजाजत है?

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(Image Credits: The Indian Express)

मोदी सरकार ने गरीब सवर्णो को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मंजूरी दे दी है। रविवार 6 जनवरी को रामलीला मैदान में दलितों के लिए समरसता खिचड़ी बनवाने के अगले ही दिन सवर्णो पर दांव क्यों चला गया। सियासत के जानकारों का मानना है की सवर्ण वोटरों की नाराजगी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है। क्योंकि उसे अब आम चुनाव में जाना हैं।

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भाजपा को यह आशंका थी कि दलितों और पिछड़ों की तरफ झुकाव के कारण कहीं उसका कोर वोटर खिसक न जाए। राजनीतिक जानकारों का यह कहना है कि संविधान में मौजूदा प्रावधानों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। इस हाल में सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा और इसके लिए दोनों सदनों में उसे दी तिहाई बहुमत चाहिए होगा।

अपर कास्ट के लिए आरक्षण की पैरवी की बात बसपा सुप्रीमो मायावती और दलित नेता रामदास अठावले, राम विलास पासवान भी कर चुके हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को पहले ही ख़ारिज कर चूका है।

1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागु होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इस असवैंधानिक करार देते हुए इस फैसले को ख़ारिज कर दिया।

अदालत ने जाट आरक्षण खत्म करने का फैसला देते हुए कहा था कि केवल जाति पिछड़ेपन का आधार नहीं हो सकती है। राजस्थान सरकार ने 2015 में उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए 5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी। उसे भी निरस्त कर दिया गया।  हरियाणा सरकार का भी ऐसा फैसला न्यायालय में नहीं टिक सका था, तो फिर केंद्र सरकार के इस कदम का क्या होगा?


केंद्र सरकार ने भी जो दांव चला है उसमें अनुसूचित जाति जनजाति तथा पिछड़े वर्ग को मिल रहे आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी बल्कि अलग से गरीब सवर्णों को आरक्षण दिया जाएगा। सामाजिक चिंतको का कहना है कि हमारे देश में जातिगत भेदभाव भी गरीबी और पिछड़ेपन का मुख्य कारण रहा है, इसी कारण यहां जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान लागु किया गया।

परन्तु इसके कारण असंतोष भी पैदा हुआ है और समाज के अनेक वर्ग अलग अलग राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के साथ आंदोलन के कर रहे हैं,और सरकार के ऊपर दबाव बना रहें हैं।

भारत में आरक्षण की व्यवस्था

भारतीय संविधान के अनुछेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है, बशर्ते ये शाबित किया जा सके कि वे बाकी के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। इसको तय करने के लिए कोई भी राज्य अपने यहां पिछड़े वर्ग आयोग का गठन करके अलग अलग वर्गों की सामाजिक स्थिति की जानकारी ले सकता हैं।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार आमतौर पर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता। आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत एससी के लिए 15, एसटी के लिए 7.5 व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण है। यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण कि कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए अब तक जिन राज्यों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की गई तो कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया था।

क्या नया है सवर्णो को आरक्षण देने का मुद्दा?

भाजपा ने 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया था। परन्तु इसका लाभ नहीं हुआ और बाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई। वर्ष 2006 में कांग्रेस ने भी एक कमेटी बनाई जिसका काम आर्थिक रूप से पिछड़ों और उन वर्गों को अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं, लेकिन उसका भी कोई लाभ नहीं हुआ।

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